श्रीराम मंदिर के चढ़ावे की रकम पार करने के पीछे तमाम लापरवाही और खेल हैं। जिनकी परतें अब खुल रही हैं। दरअसल, बैंक ने गिनती करने वाले कर्मचारियों को एक कंपनी के जरिये आउटसोर्सिंग पर रखा हुआ था। इसमें खेल ये किया गया कि ट्रस्ट ने जो कर्मचारी तय किए, आउटसोर्सिंग पर वही लोग रखे गए। ये लोग या तो किसी पदाधिकारी के रिश्तेदार थे या फिर उनके परिचित। पूरा मामला ही गोलमाल है।
मंदिर व्यवस्था में चढ़ावे की राशि की गिनती प्रक्रिया मुख्य कार्यों में से एक है जिसकी जिम्मेदारी ट्रस्ट के बड़े पदाधिकारियों, बैंक कर्मियों की तय की गई थी, लेकिन इसी महत्वपूर्ण कार्य में लापरवाही बरती गई। या ये कहा जाए कि चढ़ावा चोरों को हाथ साफ करने का पूरा मौका दिया गया। न निगरानी की गई, न कर्मचारियों का सत्यापन और न ही उनकी कोई जामा तलाशी की जाती थी। इसलिए वह बेखौफ होकर रकम पार करते रहे। चूंकि कर्मचारी ट्रस्ट की तरफ से रखे गए थे, इसलिए बैंक अधिकारियों की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह इस पर सवाल उठा सकें। वहीं दूसरा पहलू ये भी है कि इसमें बैंक की भी भूमिका संदिग्ध है। उनके कर्मचारियों या अधिकारियों की भी मिलीभगत हो सकती है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता।







