उत्तराखंड/चमोली : जीवित है आज भी उत्तराखण्ड में पौराणिक देव संस्कृति, कहते हैं मानो तो देवता और न मानो तो पत्थर।

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यह देव संस्कृति की ख़बर चमोली जिले से है। कहते हैं मानो तो देवता और न मानो तो पत्थर। उत्तराखण्ड में चारों ओर देवी देवताओं का वास है यह सिर्फ किंवदंतियों में ही नहीं सिमटा हुआ है बल्कि इनकी झलक भी समय समय पर देखने और सुनने को मिल जाती हैं। यहां के हर गांव और हर घरों में मनुष्यों पर देवी देवताओं का अवतरित होना देखा जा सकता है।यही कारण है कि उत्तराखंड में जब भी कोई देवी देवताओं के पूजा अर्चना के कार्यक्रम होते हैं तो लोगों का विश्वास एवं अगाध श्रद्धा फूट पड़ती है।इसकी एक और बानगी हम अपने दर्शकों को बताने और दिखाने के लिए ग्राउंड जीरो से कुछ झलकियां लाये हैं।

चमोली जिले के पिंडर घाटी के ज्यूड़ा गांव में इन दिनों पांडव लीला जिसे स्थानीय भाषा में कौथीक कहते हैं का आयोजन किया जा रहा है जो आज अपने नौवें दिन में प्रवेश कर पांडव कालीन कुरूक्षेत्र संग्राम के मंचन में पांडवों की विजय के साथ संपन्न हुई है। शब्दों में कहने के लिए तो यह सिर्फ मंचन या कौथीक है परंतु इस पांडव लीला के मंचन में जितने भी किरदार होते हैं उन सभी पर कौरव और पांडव अवतरित होते हैं।

कुरूक्षेत्र के कौथीक को देखने और देवी देवताओं व पांडवों के दर्शन कर पूजा अर्चना के लिए क्षेत्रीय महिलाओं,पुरूषों और ध्याणियों यानी कि विवाहिता महिलाओं की भारी तादाद में भीड़ जुटी हुई रही। ज्यूडा गांव में पिछले आठ दिनों से चल रहे पांडव कोथीक के क्रम में पांडव कालीन वृतांत पांडव जागर गीतों के गायकों के द्वारा गाकर लोगों पर पांडव और कौरव अवतरित किए जाते हैं,और तब होते हैं देवी देवताओं और पांडवों के पौराणिक संस्कृति से आज भी चलते हुए पारंपरिक नृत्य।जिसके लिए गांव के ढोल-दमाऊं के विशेष बाजीगर जिनके थापों और तालों पर नृत्य किए जाते हैं।

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नौवें दिन कुरुक्षेत्र के संग्राम में पांडवों ने कौरवों पर विजय पाने के साथ ही पांडवों के पश्वाओं ने मेले में आए हुए श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिए। ग्रामीण आयोजकों ने बताया कि ज्यूडा गांव में पिछले सत्रह वर्षों के बाद पांडवों का आह्वान कर उनके नृत्य का आयोजन किया गया है। वे कहते हैं कि दो सालों से लगातार देश विदेश और स्थानीय स्तर पर कोविड महामारी ने भारी तबाही मचाई है। कहा कि रोजगार के लिए शहरों में गये हमारे नाते-रिश्तेदारों और नौजवानों ने लॉकडाउन के कारण दर दर की ठोकरें खाते हुए सुरक्षित अपने घर-गांव तक पहुंचाने के लिए देवी देवताओं से मनोतियां मांगी थी,और आज भी हमारी अपने देवी देवताओं से यही प्रार्थना है कि कोरोना के संक्रमण से जिस तरह दो सालों से उनके गांव और क्षेत्र वासियों को सुरक्षित रखने की कृपा बनी हुई है उसी प्रकार आगे भी इसी तरह देवी देवताओं की कृपा बनी रहे। आयोजक बताते हैं कि इन्हीं सब कारणों से उन्होंने पांडवों को पूजने के लिए यह महायज्ञ किया है।इससे गांव में खुशहाली बनी रहेगी। बताते चलें कि नौवें दिन पांडवों के कुरुक्षेत्र विजय के उपरांत दसवें दिन ब्राह्मणों और क्षेत्रवासियों के लिए ब्रह्मभोज के आयोजन के साथ ही पांडव लीला का समापन किया जायेगा।और देवी देवताओं व पांडवों से गांव क्षेत्र में खुशहाली की कामनाओं के साथ उन्हें मंदिरों में पूजा-अर्चना एवं हवन-यज्ञ के साथ विराजमान कर दिया जायेगा।


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