अयोध्या में स्थित राम मंदिर इस वक्त चर्चाओं में है। मंदिर परिसर के दानपात्रों से ‘गबन’ का आरोप इस चर्चा की वजह है। उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है।
आखिर यह पूरा मामला क्या है? यह किस दौर में हुआ? कैसे राम मंदिर के दानपात्रों से कथित तौर पर करोड़ों रुपये की राशि गायब की जाती रही? इस मामले का खुलासा कैसे हुआ? किस-किस पर इस घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे हैं? आइये जानते हैं…
चोरी का तरीका बेहद शातिराना था। गिनती शुरू करने से पहले सभी दानपात्रों को खोलकर पूरी रकम एक जगह इकट्ठा कर ली जाती थी, जिससे पहले से यह पता नहीं रहता था कि कुल कितनी रकम है। इसी का फायदा उठाकर कर्मचारी गिनती के दौरान ही रकम पार कर देते थे। अंत में जोड़-घटाकर जो रकम बचती, उसी का विवरण दर्ज कर दिया जाता था, जिससे चोरी पकड़ में नहीं आती थी।3. बिना तलाशी के कर्मियों की आवाजाही
मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम होने के बावजूद ट्रस्ट की तरफ से रखे गए ये कर्मचारी गले में आईकार्ड पहनकर मंदिर के कोने-कोने तक बेखौफ आते-जाते थे। सबसे बड़ी चूक यह रही कि ट्रस्ट के अपने लोग होने के कारण इन कर्मचारियों की न तो कोई तलाशी ली जाती थी और न ही इनका सत्यापन किया गया था। आरोप है कि महाकुंभ और माघ मेले के दौरान जब चढ़ावा कई गुना बढ़ गया था, तो इसका फायदा उठाकर इन चोरों ने लंबी गिनती का फायदा उठाया और एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार कर दिए।







