यशवंत वर्मा केस- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जस्टिस वर्मा को हटाने का प्रस्ताव किया स्वीकार, तीन सदस्यीय समिति गठित

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लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मंगलवार को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के लिए बहुदलीय नोटिस स्वीकार करने के बाद उनके खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। इससे इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो गई। इस जांच समिति में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और कर्नाटक उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता बी. वी. आचार्य शामिल हैं।

बिरला ने कहा, ‘समिति जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने का प्रस्ताव जांच समिति की रिपोर्ट मिलने होने तक लंबित रहेगा।’ इससे पहले लोकसभा स्पीकर ने कहा कि उन्हें 21 जुलाई को रविशंकर प्रसाद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित 146 लोकसभा सदस्यों की ओर से न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने का प्रस्ताव मिला था।

न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के थे
14 मार्च को उनके सरकारी आवास पर जले हुए नोटों की गड्डियां मिलने के बाद न्यायमूर्ति वर्मा को दिल्ली से इलाहाबाद उच्च न्यायालय भेज दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के संबंधित कानूनों और फैसलों का हवाला देने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने पाया कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोप गंभीर प्रकृति के थे।

ओम बिरला ने क्या-क्या कहा?
ओम बिरला ने कहा कि बेदाग चरित्र, वित्तीय और बौद्धिक ईमानदारी न्यायपालिका में एक आम व्यक्ति के विश्वास की नींव है। उन्होंने कहा, ‘मौजूदा मामले से जुड़े तथ्य भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124, अनुच्छेद 217 और अनुच्छेद 218 के अनुसार कार्रवाई के योग्य हैं। संसद को इस मुद्दे पर एक स्वर में बोलने की जरूरत है। इस देश के प्रत्येक नागरिक को भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की अपनी प्रतिबद्धता का स्पष्ट संदेश देना चाहिए।’ लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के अनुसार न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है।

न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश की गई थी
इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने 7 अगस्त, 2025 को कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश करने वाली आंतरिक जांच प्रक्रिया को कानूनी मान्यता प्राप्त है। जस्टिस वर्मा के आवासीय परिसर में आग लगने के बाद जले हुए नोट मिले थे। उस समय वे दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे।

और पढ़े  संविधान सभा का इतिहास:- कभी गोहत्या पर बैन के लिए इन मुस्लिम सदस्यों ने उठाई थी आवाज, कुरान का भी हुआ था जिक्र

 

 

सुप्रीम कोर्ट से मिला था करारा झटका
इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से आंतरिक जांच पैनल की रिपोर्ट को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया था। शीर्ष अदालत ने जस्टिस वर्मा की उस मांग को भी खारिज कर दिया था, जिसमें भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना की ओर से उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश को रद्द करने की अपील की गई थी।


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