संविधान सभा का इतिहास:- कभी गोहत्या पर बैन के लिए इन मुस्लिम सदस्यों ने उठाई थी आवाज, कुरान का भी हुआ था जिक्र

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मुस्लिम समुदाय के कुछ वर्गों की तरफ से हाल ही में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठी है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है, जब गाय को लेकर इस तरह की मांग की गई हो। गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और गायों की हत्या पर प्रतिबंध लगाने से जुड़ी मांगों के इतिहास में जाएं तो सामने आता है कि भारत की आजादी के ठीक बाद जब भारत के संविधान को लेकर संविधान सभा में बहस चल रही थी तो इसके एक मुस्लिम सदस्य ने न सिर्फ गोहत्या पर प्रतिबंध की मांग की थी, बल्कि इसे मौलिक अधिकारों की श्रेणी में शामिल करने की मांग तक कर दी थी।

 

आइये जानते हैं…

 

 

कौन थे संविधान सभा के वह मुस्लिम सदस्य, जिन्होंने गोहत्या पर प्रतिबंध की मांग की थी?

संविधान सभा की बहसों पर एक नजर डालने से पता चलता है कि दो मुस्लिम सदस्यों ने गायों की हत्या पर राज्य के रुख को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की मांग की थी। इनमें से एक जहीरुल हसनैन लारी और दूसरे सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला थे।

1. जहीरुल हसनैन लारी

जन्म: 17 जनवरी 1907, उत्तर प्रदेश के लार में एक ‘इराकी बिरादरी’ के परिवार में।

शिक्षा: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बी.ए., एम.ए., और एलएल.बी.।

पेशा: वकील, गोरखपुर की जिला अदालत व इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत की।

राजनीति 

  • यूनाइटेड प्रोविंस (मौजूदा उत्तर प्रदेश) में मुस्लिम लीग के एक प्रमुख नेता और पाकिस्तान आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता।
  • 1937 और 1946 के प्रांतीय चुनाव जीते थे और यूपी विधानसभा में विपक्ष के उप-नेता बने। बाद में भारत की संविधान सभा के सदस्य बने।
  • संविधान सभा में उन्होंने अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों, जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के मुद्दे उठाए।

1949 में लारी ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया और मई 1950 में वे पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान में उन्हें सिंध चीफ कोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। बाद में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया और कराची में वकालत शुरू कर दी। 13 मार्च 1972 को कराची में उनका निधन हो गया।

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2. सर सैयद मोहम्मद सादुल्ला

जन्म: 21 मई 1885, गुवाहाटी (असम) के एक असमिया मुस्लिम परिवार में।

शिक्षा: कॉटन कॉलेज, गुवाहाटी और प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता से अपनी उच्च शिक्षा।

पेशा: वकील, गुवाहाटी और कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबे समय तक प्रैक्टिस।

राजनीति

  • ब्रिटिश भारत में 1937 से 1946 के बीच कई बार असम प्रांत के प्रधानमंत्री (प्रीमियर) रहे। ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की कार्यकारी समिति के सदस्य रहे।
  • 1947 में असम विधानसभा ने उन्हें भारत की संविधान सभा के लिए चुना था। वे संविधान की ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य चुने गए।

ब्रिटिश सरकार की तरफ से उन्हें 1928 में नाइटहुड और 1946 में नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर की प्रतिष्ठित उपाधियों से सम्मानित किया गया था। 8 जनवरी 1955 को गुवाहाटी में ही उनका निधन हुआ।

गोहत्या पर क्या था इन दोनों मुस्लिम नेताओं का रुख?

संविधान सभा में गोहत्या के मुद्दे पर जहीरुल हसनैन लारी और सैयद मोहम्मद सादुल्ला का रुख काफी स्पष्ट था, लेकिन दोनों के तर्क एक-दूसरे से भिन्न थे।

जहीरुल हसनैन लारी का रुख

जहीरुल हसनैन लारी ने संविधान सभा की बहस में मांग की थी कि गोहत्या के मुद्दे पर स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट होनी चाहिए और इसमें कोई अस्पष्टता या संदेह नहीं होना चाहिए। उन्होंने सदन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि भारत के मुसलमान यह मानते हैं कि वे बकरीद जैसे मौकों पर गायों और अन्य जानवरों की कुर्बानी दे सकते हैं।

लारी का मानना था कि अगर बहुसंख्यक समुदाय गोहत्या को रोकना चाहता है, तो इसके लिए कोई भी बात घुमा-फिरा कर नहीं कही जानी चाहिए। उन्होंने पुरजोर वकालत की कि गोहत्या के प्रतिबंध को नीति निर्देशक तत्वों यानी डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में अस्पष्ट छोड़ने और प्रांतीय सरकारों के फैसले पर छोड़ने के बजाय, इसे सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। उनका स्पष्ट कहना था कि यदि इसे प्रतिबंधित करना ही है, तो इसे स्पष्ट और असंदिग्ध शब्दों में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

सैयद मोहम्मद सादुल्ला का रुख

सैयद मोहम्मद सादुल्ला ने गोहत्या पर प्रतिबंध का समर्थन तभी करने की बात कही, जब इसका कारण स्पष्ट रूप से धार्मिक बताया जाए। उन्होंने कहा था कि अगर संविधान निर्माता खुलकर यह कहते हैं कि यह हमारे धर्म का हिस्सा है और इसलिए धार्मिक आधार पर गाय की रक्षा की जानी चाहिए, तो वे इसमें कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेंगे।

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हालांकि, सादुल्ला ने आर्थिक और कृषि सुधारों का हवाला देकर गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अपने तर्कों में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें रखीं।

  • उन्होंने स्पष्ट किया कि गरीब मुसलमान आमतौर पर महंगा मटन नहीं खरीद सकते, इसलिए वे कभी-कभार ही गाय के मांस का सेवन करते हैं, और कसाईखानों में भी अधिकतर सिर्फ बांझ गाएं ही जाती हैं।
  • उन्होंने मुसलमानों पर लगने वाले इस आरोप का खंडन किया कि वे हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए गोहत्या करते हैं।
  • असम का प्रतिनिधित्व करते हुए सादुल्ला ने एक दिलचस्प तथ्य भी पेश किया कि असम में गोमांस का सेवन करने वाले मुख्य रूप से पहाड़ी लोग थे। उन्होंने शिलॉन्ग का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां 70 पहाड़ी कसाइयों के मुकाबले सिर्फ एक मुस्लिम कसाई था।

इस तरह लारी जहां गोहत्या पर प्रतिबंध को स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकारों में शामिल कर हर तरह के भ्रम को दूर करना चाहते थे, वहीं सादुल्ला इसे केवल धार्मिक आधार पर स्वीकार करने को तैयार थे, लेकिन आर्थिक आधार पर इसका सख्त विरोध कर रहे थे।

अभी क्यों चर्चा में है गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का मुद्दा?

शंकराचार्य का अभियान: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने के लिए एक बड़ा अभियान छेड़ रखा है। उन्होंने गोभक्तों को शपथ दिलाते हुए मांग की है कि चुनाव में वोट का आधार गोमाता की रक्षा होना चाहिए।

मुस्लिम समुदाय और नेताओं का समर्थन: जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भी गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की पुरजोर मांग की है। उनका तर्क है कि अगर सरकार ऐसा करती है तो गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग और बेगुनाहों पर हिंसा की घटनाएं बंद हो जाएंगी। भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, देवबंदी उलेमा कारी इसहाक गोरा और मुस्लिम समुदाय की कई महिलाओं ने भी इस मांग का खुला समर्थन किया है।

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राजनीतिक प्रतिनिधियों की मांग: हाल ही में मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के मुस्लिम विधायक आतिफ अकील ने यह मुद्दा उठाया। वहीं, बिहार के समस्तीपुर से राजद के मुस्लिम एमएलसी मोहम्मद सोहैब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर गाय को भारतीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार बताते हुए इसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की है।

इस मुद्दे पर संसद में क्या हुआ?

बीते साल संसद में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की तरफ से पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 246 (3) के तहत पशुओं का संरक्षण राज्य के अधिकार क्षेत्र का विषय है।

अदालतों ने इस मुद्दे पर क्या कहा है? 

समय-समय पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों ने भी गाय को राष्ट्रीय पशु बनाने की वकालत की है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट (2021): गोकशी के एक आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए जस्टिस शेखर कुमार यादव ने कहा था कि गाय को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाना चाहिए और इसकी सुरक्षा को हिंदुओं के मूलभूत अधिकारों में शामिल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने अपने आदेश में वेद और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में गाय के महत्व का हवाला देते हुए कहा था कि जब किसी देश की संस्कृति और विश्वास को ठेस पहुंचती है, तो देश कमजोर होता है।

राजस्थान हाई कोर्ट (2017): जयपुर की हिंगोनिया गोशाला से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस महेश चंद्र शर्मा ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सिफारिश की थी। उन्होंने राज्य सरकार के मुख्य सचिव और महाधिवक्ता को निर्देश दिया था कि वे केंद्र सरकार से तालमेल स्थापित कर इसके लिए जरूरी कदम उठाएं। साथ ही, कोर्ट ने गोहत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान करने की भी सिफारिश की थी।


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