दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने शुक्रवार को अपने पत्ते खोल दिए। पार्टी ने हाईप्रोफाइल मानी जाने वाली इस सीट से पूर्व हाउसिंग बोर्ड अध्यक्ष आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी घोषित किया है। पार्टी के इस फैसले ने दतिया की सियासत में भूचाल ला दिया है, क्योंकि लंबे समय से इस सीट पर पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का वर्चस्व रहा है।
दतिया को नरोत्तम मिश्रा का गढ़ कहा जाता है। वे कई बार यहां से विधायक चुने गए और राज्य सरकार में गृहमंत्री की अहम जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। ऐसे में उनकी जगह किसी नए चेहरे को उतारना भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक फैसला है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी ने इस बार स्थानीय समीकरण, जातीय गणित और संघ की राय को ध्यान में रखकर यह बदलाव किया है। उपचुनाव में ताजा चेहरे और संगठन की पकड़ को चुनावी हथियार बनाने की रणनीति के तहत ही आशुतोष तिवारी पर दांव लगाया गया है।
संघ की पसंद हैं आशुतोष
आशुतोष तिवारी दतिया के पुराने भाजपा कार्यकर्ता हैं। छात्र जीवन से ही वे संघ की शाखाओं से जुड़े रहे। बाद में पार्टी संगठन में विभिन्न पदों पर काम किया। हाउसिंग बोर्ड अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने गरीबों के लिए आवास योजना को गति दी थी। उनकी छवि एक शांत, मृदुभाषी और संघर्षशील नेता की है। पार्टी को उम्मीद है कि उनकी यह छवि दतिया के शहरी और ग्रामीण दोनों मतदाताओं को साधने में मदद करेगी। भाजपा के उम्मीदवार घोषित होते ही कांग्रेस में भी हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस अभी अपने प्रत्याशी के नाम पर मंथन कर रही है। संभावित दावेदार कुंवर घनश्याम सिंह ने पहले ही नामांकन फॉर्म खरीद लिया है।
अब मुकाबला सीधे BJP के आशुतोष तिवारी और कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार के बीच माना जा रहा है। नरोत्तम मिश्रा के न होने से कांग्रेस को यह मौका लग रहा है कि वह परिवर्तन के मुद्दे को भुना सके। वहीं भाजपा विकास और संगठन के नाम पर वोट मांगने की तैयारी में है।
दतिया सीट पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द होने के बाद खाली हुई है। हाईकोर्ट से उनकी याचिका खारिज होने के बाद अब उपचुनाव का रास्ता पूरी तरह साफ है। भाजपा के लिए यह सीट प्रतिष्ठा का सवाल है। पार्टी नहीं चाहती कि उसके गढ़ में सेंध लगे। इसलिए संघ की पसंद और जमीनी कार्यकर्ता को टिकट देकर उसने साफ संदेश दिया है कि वह संगठन को प्राथमिकता दे रही है। अगले कुछ दिनों में वे नामांकन दाखिल करेंगे और प्रचार शुरू करेंगे। भाजपा ने भी प्रचार की रूपरेखा तैयार कर ली है। संघ के पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं के दौरे भी शुरू होंगे। दतिया का उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रहा। यह भाजपा की नई रणनीति और कांग्रेस की वापसी की लड़ाई बन गया है। नरोत्तम युग के बाद दतिया किसे चुनता है, इसका फैसला आने वाले दिन तय करेंगे।पार्टी को एकजुट रखना बढ़ी चुनौती होगी
वरिष्ठ पत्रकार देवश्री माली का कहना है कि भाजपा ने नया चेहरा उतारकर स्थानीय स्तर पर एक नया संदेश देने की कोशिश की है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती चुनावी रणनीति और संगठनात्मक नेटवर्क को कम समय में सक्रिय करना होगी। उनके अनुसार, दतिया में भाजपा लंबे समय तक डॉ. नरोत्तम मिश्रा के मजबूत जनाधार और उनके समानांतर संगठनात्मक नेटवर्क के सहारे चुनाव लड़ती रही है। नरोत्तम की व्यक्तिगत पकड़ बूथ स्तर तक मानी जाती थी। ऐसे में नए उम्मीदवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उस नेटवर्क को कम समय में प्रभावी ढंग से सक्रिय करना और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना होगी। यदि भाजपा संगठन और संघ का मजबूत सहयोग नए उम्मीदवार को मिला, तो चुनावी मुकाबले में पार्टी को बढ़त मिल सकती है। वहीं कांग्रेस भी इस उपचुनाव को पूरी ताकत से लड़ने की तैयारी में है।







