मरीजों तक पहुंचने वाले टीके-दवा की होगी निगरानी, जानें नया नियम, कैसे एक कदम से रुकेंगी गड़बड़ियां?

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केंद्र सरकार ने हाल ही में एक बड़े बदलाव का एलान किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए एक नोटिफिकेशन के जरिए अब देश में अलग-अलग तरह की कई दवाओं-टीकों को क्यूआर कोड आधारित निगरानी तंत्र में लाने के निर्देश दिए गए हैं। यानी सरकार ने अब एक ऐसा ढांचा खड़ा करने की तरफ कदम बढ़ाए हैं, जिसके जरिए हर एक मरीज तक पहुंचने वाली दवाओं की जानकारी न सिर्फ सरकार के पास उपलब्ध हो, बल्कि इससे जुड़ी डीटेल्स को खुद ग्राहक भी देख सकें।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर सरकार की तरफ से हालिया समय में कानून में क्या बदलाव किया गया है? दवाओं पर क्यूआर कोड लगाकर इसकी निगरानी का तंत्र काम कैसे करेगा? इन बदलावों को लागू करने की जरूरत क्यों है और इसके पीछे सरकार की क्या मंशा है? इस व्यवस्था को लागू करने में क्या चुनौतियां आ सकती हैं? आइये जानते हैं…

क्या है दवाओं के निगरानी तंत्र में बदलाव का कदम?

सरकार की तरफ से दवाओं के निगरानी तंत्र को मजबूत करने और नकली दवाओं पर लगाम लगाने के लिए औषधि नियम, 1945 में संशोधन किया गया है। इस संशोधन के तहत नियम के शेड्यूल एच2 के दायरे को बढ़ाया गया है।

1. दवा निर्माताओं के लिए नियम में क्या बदलाव

पैकेजिंग पर क्यूआर कोड छापना अनिवार्य  
नए नियमों के तहत दवा निर्माताओं के लिए दवाओं की प्राथमिक पैकेजिंग लेबल पर बारकोड या क्विक रिस्पांस (क्यूआर) कोड छापना या लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। अगर प्राथमिक पैकेजिंग पर जगह कम है, तो इसे अंदरूनी या बाहरी किसी भी पैकेजिंग पर छापा जा सकता है।

नई दवाएं दायरे में शामिल

  • पहले क्यूआर कोड छापने की अनिवार्यता देश की सिर्फ शीर्ष 300 दवा ब्रांडों पर लागू थी। हालांकि, अब इस संशोधन के बाद क्यूआर कोड छापने की अनिवार्यता का दायरा दवा कंपनियों के साथ कई और दवा ब्रांड्स तक बढ़ेगा।
  • नए नियम के तहत सभी वैक्सीन (टीके), रोगाणुरोधी (एंटी-वायरल, एंटीबायोटिक्स), कैंसर रोधी दवाओं और एनडीपीएस एक्ट, 1985 के तहत आने वाली सभी मादक और नशा पैदा करने वाली दवाओं को इस डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम के दायरे में लाया गया है।

2. ग्राहकों के लिए क्या बदलाव

दवा की पैकेजिंग पर मौजूद क्यूआर कोड को स्कैन करने पर दवा के बारे में नौ अहम जानकारियां मिलेंगी। इनमें दवा का विशिष्ट पहचान कोड, ब्रांड और जेनेरिक नाम, निर्माता का नाम और पता, बैच नंबर, निर्माण की तारीख, एक्सपायरी डेट और मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस नंबर आदि शामिल होंगे। यानी ग्राहक दवा की हर जानकारी हासिल कर सकेंगे और इसकी गुणवत्ता और असली-नकली होने का फर्क भी पता लगा सकेंगे।

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दवा कंपनियों के लिए कब से लागू होगा यह नियम?

दवा कंपनियों को नए क्यूआर कोड सिस्टम को अपनाने के लिए सरकार ने अलग-अलग समय-सीमा तय की है, ताकि वे आसानी से इस बदलाव को लागू कर सकें। सरकार ने  साथ ही उन्हें यह भी सुझाव दिया है कि सप्लाई चेन में पारदर्शिता लाने और नकली दवाओं को रोकने के लिए वे तय समय से पहले भी स्वेच्छा से इस नियम को अपना सकती हैं।

कैसे रखी जाएगी हर दवा पर निगरानी?

  • दवाओं पर क्यूआर या बार कोड लगाकर निगरानी करने का यह तंत्र ट्रैक-एंड-ट्रेस प्रणाली पर आधारित होगा, जो दवा के निर्माण (फैक्ट्री) से लेकर मेडिकल स्टोर तक पहुंचने की पूरी यात्रा पर नजर रखता है।
  • निगरानी को पुख्ता बनाने के लिए दवा निर्माताओं, थोक व्यापारियों, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं को इन दवाओं को एक विशेष ट्रैक एंड ट्रेस प्लेटफॉर्म पर दर्ज (लॉग-इन) करना होगा।
  • इससे उपभोक्ता, फार्मासिस्ट या सप्लाई चेन से जुड़ा कोई भी व्यक्ति स्मार्टफोन एप का इस्तेमाल कर क्यूआर कोड को स्कैन कर सकता है। स्कैन करते ही दवा का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड स्क्रीन पर आ जाएगा। इससे डिब्बे या दवा की अंदरूनी पैकेजिंग पर छपी जानकारी का मिलान डिजिटल रिकॉर्ड से तुरंत किया जा सकता है।

चूंकि इस सिस्टम के जरिए दवा के कारखाने में बनने से लेकर मेडिकल स्टोर तक पहुंचने के हर एक कदम को ट्रैक एंड ट्रेस प्लेटफॉर्म पर दर्ज किया जाएगा, ऐसे में अगर कोई जालसाज बीच रास्ते में असली दवा में मिलावट करने या बिना एक्टिव सामग्री वाली नकली दवाएं बाजार में उतारने की कोशिश करता है, तो इस ट्रैकिंग के जरिए खुलासा हो जाएगा कि गड़बड़ किस स्रोत पर हुई। इससे सप्लाई चेन में ही गड़बड़ी को रोकने में मदद मिलेगी।

नकली दवाओं पर नकेल कसने में कैसे मदद मिलेगी?

एक कोड, एक दवा: हर दवा की यूनिट, जैसे- पत्ते, डिब्बे या शीशी का अपना एक यूनिक क्यूआर कोड या बार कोड होगा। जालसाज अक्सर असली दवाओं की खाली शीशियों या डिब्बों (जैसे कैंसर की महंगी दवाओं की खाली शीशियों) में सस्ती या नकली दवाएं भरकर बेच देते हैं। लेकिन नए सिस्टम में अगर वे असली डिब्बे का दोबारा इस्तेमाल करते हैं, तो वे पकड़े जाएंगे, क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एक बार रजिस्टर हो चुके यूनिक कोड को दोबारा रजिस्टर नहीं किया जा सकता है। ऐसे में इस दवा की पैकेजिंग को एक बार स्मार्टफोन से स्कैन करने पर पता चल जाएगा कि वह दवा पहले बिक चुकी है या नहीं। यह सिस्टम सरकार को भी अलर्ट करने के काम आएगा।

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तुरंत स्कैनिंग और वेरिफिकेशन: अगर दवा पर छपे क्यूआर या बार कोड स्कैन से मिला डेटा, डिब्बे पर छपी जानकारी से मेल नहीं खाता है या कोड वेरिफाई नहीं होता है, तो वह दवा संदिग्ध या नकली मानी जाएगी और रेगुलेटर्स को इसकी जानकारी दी जा सकेगी। इतना ही नहीं अगर कभी जांच में किसी दवा का कोई बैच खराब या नकली पाया जाता है, तो ट्रैकिंग सिस्टम से अधिकारियों को तुरंत पता चल जाएगा कि वह बैच इस समय बाजार में किस जगह पर है। इससे उन खराब दवाओं को मरीजों तक पहुंचने से पहले ही वापस मंगाया जा सकता है।

दवाओं के निगरानी तंत्र में बदलावों की जरूरत क्यों और कितनी?

1. नकली और घटिया दवाओं के व्यापार पर रोक 
इस प्रणाली को लागू करने का सबसे प्रमुख कारण बाजार में नकली और घटिया दवाओं के प्रसार को रोकना है। कुछ समय पहले ही एक मीडिया समूह एक जांच में सामने आया था कि कुछ जालसाज अस्पताल के कर्मचारियों के साथ मिलकर कीट्रूडा (Keytruda) जैसी बेहद महंगी कैंसर दवाओं की खाली शीशियां चुरा लेते थे और उनमें सस्ती एंटी-फंगल दवा भरकर कैंसर मरीजों को लाखों रुपये में बेच देते थे। हर डिब्बे और शीशी पर अपना यूनिक कोड होने से इस तरह की धोखाधड़ी और दोबारा इस्तेमाल पर रोक लगेगी।

2. एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस से निपटना 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, कम और मध्यम आय वाले देशों में नकली एंटीबायोटिक्स और एंटी वायरल की भारी मात्रा है। घटिया या नकली एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल से मरीजों को दवा की सही खुराक नहीं मिल पाती, जिससे जीवाणुओं में दवा के प्रति प्रतिरोध पैदा होने लगता है। दवाओं की ट्रैकिंग से एंटी-माइक्रोबियल रेजिस्टेंस के खिलाफ भारत की लड़ाई को मजबूती मिलेगी।

3. नशीली दवाओं की तस्करी और दुरुपयोग रोकना
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने मेडिकल ओपिओइड और साइकोट्रोपिक दवाओं के अवैध बाजारों में लीक होने पर चिंता जताई है। इन दवाओं की डिजिटल निगरानी से सरकार के नशा मुक्त भारत अभियान को समर्थन मिलेगा और इन दवाओं के अवैध वितरण पर सख्त नियंत्रण रखा जा सकेगा।

4. खराब दवाओं की तुरंत बाजार से वापसी 
अगर कभी निर्माण में गड़बड़ी के कारण किसी दवा का कोई बैच खराब या दूषित पाया जाता है, तो ट्रैक-एंड-ट्रेस तकनीक अधिकारियों को खराब दवाओं को सटीक रूप से ट्रैक करके बाजार से तुरंत वापस मंगाने में मदद करेगी। यह बदलाव दूषित कफ सिरप से बच्चों की मौत जैसी हालिया घटनाओं के बाद काफी जरूरी है। अमेरिका के दवा नियामक- एफडीए और यूरोप के दवा नियामक- यूरोपीय मेडिसिन एजेंसी (ईएमए) ने भारतीय दवाओं के क्वालिटी कंट्रोल पर चिंताएं जताई थीं और भारत को नकली दवाओं का एक प्रमुख स्रोत भी बताया था। नया सिस्टम इन चिंताओं को दूर करेगा।

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इतना ही नहीं, यह कदम भारतीय नियामक को डब्ल्यूएचओ के मैच्योरिटी लेवल 4 यानी सर्वोच्च स्तर तक पहुंचाने में मदद करेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय दवाओं की स्वीकार्यता और भरोसा बढ़ेगा।

इस व्यवस्था को लागू करने में क्या चुनौतियां आ सकती हैं? 

1. छोटे दवा निर्माताओं पर बढ़ सकता है आर्थिक बोझ: हर दवा के पैकेट के लिए एक अलग यूनिक कोड जेनरेट करने और पूरी सप्लाई चेन में उसे ट्रैक करने के लिए कंपनियों को नई तकनीक और ट्रैकिंग प्लेटफॉर्म में निवेश करना होगा। छोटे निर्माताओं खासकर एमएसएमई के लिए यह अतिरिक्त लागत उठाना काफी मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा, ‘शेड्यूल एच2’ की कई दवाएं आवश्यक दवाओं के वर्ग में आती हैं, जिनकी कीमतें सरकार की तरफ से नियंत्रित होती हैं, जिससे कंपनियों के लिए यह लागत निकालना और भी चुनौतीपूर्ण होगा।

2. मजबूत आईटी और डेटाबेस इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत: यह व्यवस्था तभी कारगर होगी जब इसे एक ऐसे सरकारी डेटाबेस का समर्थन मिले, जिस तक फार्मासिस्ट और नियामक रियल-टाइम में आसानी से पहुंच बना सकें। इसके लिए सभी राज्यों में इंटरऑपरेबल सॉफ्टवेयर और मजबूत स्कैनिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का होना बहुत जरूरी है।

3. क्यूआर कोड की नकल का खतरा: विशेषज्ञों ने चेताया है कि यह तकनीक पूरी तरह से फुलप्रूफ यानी शत-प्रतिशत सुरक्षित नहीं है। जालसाज उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करके क्यूआर कोड की नकल करने या उसे दोहराने की कोशिश कर सकते हैं।

4. लॉगिंग में देरी से भ्रम की स्थिति: सिस्टम में एक बड़ी चुनौती यह भी है कि अगर कंपनी की तरफ से असली दवा को सिस्टम में दर्ज करने में थोड़ी देरी हो जाती है और इस बीच कोई जालसाज नकली दवा का कोड दर्ज कर देता है, तो सिस्टम असली दवा को भी नकली मान सकता है।

5. डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा: नशीली और साइकोट्रोपिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन का डेटा बहुत संवेदनशील होता है। इस डेटा को सुरक्षित रखने के लिए अभी तक कोई ठोस डिजिटल गवर्नेंस लेयर मौजूद नहीं है, जिसे विकसित करना एक बड़ी चुनौती होगी।


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