भीमताल: मेहरागांव में मिली तांबे की 3500 साल पुरानी दुर्लभ मानवाकृति, मूर्ति को किया संरक्षित, इतना है वजन

 

 

त्तर सिंधु सभ्यता काल की करीब 3500 साल पुरानी ताम्र मानवाकृति भीमताल के मेहरागांव से मिली है। घर के पीछे खुदाई के समय मजदूरों को यह मानवाकृति मिली है। पद्मश्री पुरातत्ववेत्ता डॉ. यशोधर मठपाल ने इस मूर्ति को उत्तर सिंधु सभ्यता काल के होने की पुष्टि करते हुए इसे ऐतिहासिक बताया है। कहा कि दुर्लभ मूर्ति का उत्तराखंड में मिलना मूर्तिकला की ताम्रनिधान संस्कृति का पहला और अनोखा प्रमाण है।

कुछ दिन पहले मेहरागांव के समाजसेवी वीरेंद्र सिंह मेहरा घर के पीछे खोदाई के समय मानवाकृति मिली। इसके ऐतिहासिक होने की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने पुरातत्वविद् डॉ. यशोधर मठपाल को इसकी जानकारी दी जिस पर उन्होंने मूर्ति का बारीकी से अध्ययन किया।

 

डॉ. मठपाल के मुताबिक मूर्ति की शैली से यह उत्तर सिंधु सभ्यता काल की 3500 साल पुरानी ताम्र मानवाकृति है। मूर्ति तांबे की बनी है। मूर्ति जंग से काली पड़ी हुई थी। इसका वजन 2 किलो 400 ग्राम और लंबाई 22 सेमी और चौड़ाई 28 सेमी है।

चपटी मूर्ति छायाचित्र जैसी
डॉ. मठपाल ने बताया कि तांबे की इस मूर्ति में आंख, कान, नाक और मुख नहीं है। यह चपटी मूर्ति एक छायाचित्र सरीखी है। उन्होंने कहा कि उक्त मूर्ति को संग्रहालय में संरक्षित रखा गया है। संग्रहालय आने वाले लोगों को इसकी जानकारी मिल सकेगी।

कुमाऊं शिवालिक में उत्तर सिंधु सभ्यता की मूर्ति मिलना आश्चर्यजनक
भारत के सांस्कृतिक इतिहास में यह पहला अवसर है जब उत्तर सिंधु सभ्यता काल की कोई मूर्ति कुमाऊं शिवालिक में लगभग 4000 फिट पर स्थित एक गांव के ढाल में मिली है। कहा कि दुर्लभ मूर्ति का उत्तराखंड में मिलना मूर्तिकला की ताम्रनिधान संस्कृति का पहला और अनोखा प्रमाण है।

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3500 साल पूर्व यहां निवास रहा होगा उत्तर सिंधु सभ्यता काल के लोगों का
पद्श्री डॉ. यशोधर मठपाल कहते हैं कि मूर्ति का यहां मिलना इस बात का भी प्रमाण है कि मेहरागांव का इतिहास बहुत पुराना है। यह बताता है कि मेहरागांव में 3500 साल पहले उत्तर सिंधु सभ्यता काल के कुछ लोग रहा करते होंगे। डॉ. मठपाल ने बताया कि डेढ़ दशक पूर्व भीमताल का जलस्तर गिरने से वहां उपलेनुमा हाथ से थापी गई दर्जनों ईंटें प्रकाश में आई थीं। उनमें से काफी लोक संस्कृति संग्रहालय में सुरक्षित हैं। कई अन्य प्राचीन मूर्तियां, सिक्के, वाद्ययंत्र और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी धरोहर पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल के खुटानी स्थित संग्रहालय में संरक्षित हैं।

पुरातत्व के विशेष जानकार हैं मूर्ति अध्ययनकार डॉ. मठपाल
पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल ने पुरातत्व में पीएचडी की है और गुफा कला के वह विशेष जानकार हैं। वर्ष 1983 में उन्होंने भीमताल में लोक संस्कृति संग्रहालय की स्थापना की। संग्रहालय में कलाकृतियों, लोक चित्रों, रॉक कला और प्रागैतिहासिक वस्तुएं मौजूद हैं। संग्रहालय में दुर्लभ पारंपरिक कला और शिल्प संबंधी कलाकृतियां भी मौजूद हैं। डॉ. मठपाल को 2006 में भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया।

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