कश्मीर फाइल्स के नाम पर देश भर में तनाव भड़काने के लिए उन्होंने अपने सारे गधे, घोड़े और खच्चर छोड़ दिए, समय की घड़ी पीछे घुमाने अब गीता का सहारा.

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कश्मीर फाइल्स के नाम पर देश भर में तनाव भड़काने के लिए उन्होंने अपने सारे गधे, घोड़े और खच्चर छोड़ दिए। अपनी राज्य सरकारों की तरफ से इस अति हिंसक, झूठी और भड़काऊ राजनीतिक पोर्नोग्राफी को देखने-दिखाने के लिए अनेक प्रलोभन दिए। सिनेमा के हर शो में टिकिट खिड़की से लेकर दर्शक दीर्घा तक शाखा शृंगालों को योजनाबद्ध तरीके से बिठाया और फिल्म समाप्ति के वक़्त उनसे उन्मादी नारे लगवाये। इसके जरिये मशहूर कराये गए अज्ञात कुलशील और अब तक अनाम रहे एक-डेढ़ टके के निर्देशक को अपने राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल कर नित नया शिगूफा छोड़ने के काम पर लगाया। इस फिल्म की विषाक्तता और नीयत पर खुद कश्मीरी पंडितों और उनकी संघर्ष समिति के बार-बार दिए बयानों को नियंत्रित और नत्थी मीडिया से लगभग ब्लैकआउट करवा दिया।

सुनते हैं वे इस फिल्म की मारकता और संक्रामकता से अभिभूत होकर अब इसी तरह की झूठ की दूसरी फाइल्स की खेपें लाने की योजना बना रहे हैं। खाईयों को चौड़ी करके उनमें बारूद बिछाने का काम पूरी तल्लीनता और जिद के साथ जारी है, ताकि मौक़ा मिलते ही उसे माचिस की तीली दिखाई जा सके और पूरे देश को एक धधकते तंदूर में बदल कर उस पर बासे आटे की रोटियां सेंकी जा सकें – जिसे आजादी के तीखे संग्राम के दौरान देश की जनता ने नकार कर कूड़े के ढेर पर डाल दिया था।

वे देश के विमर्श का सिर्फ रूप ही नहीं, सार भी बदलना चाहते हैं। यूं भी कोई किसी को सहज ही आदमखोर नहीं बना सकता। उसके लिए एक भरी-पूरी ड्रिल की जरूरत होती है। उसकी समझ और सोच को बदलना ही आवश्यक नहीं होता, उसे नए तरीके से प्रसंस्कारित भी करना होता है। सिर्फ समझदारी ही विकसित नहीं की जाती, मूर्खता भी मैन्युफैक्चर करनी होती है। शठता की यही मुहिम जारी है और हर भुजा के जरिये जारी है। कुछ दिन पहले कर्नाटक हाईकोर्ट को जिस बात का सारे फ़साने में जिक्र न था, वो बात बहुत नागवार गुजर गयी और उसने हिजाब को लेकर निर्णय की जगह धर्मोपदेश सुनाते हुए कुरआन की ही व्याख्या कर डाली, जबकि मुकद्दमा दीन की उस किताब से नहीं, जिसे भारत का संविधान कहते हैं उस किताब से जुड़ा था। बात संविधान में दिए गए मूलभूत अधिकारों की थी। इस अनावश्यक फैसले का फायदा उठाकर वहां के शिक्षा मंत्री ने अब आगे होने वाली परीक्षाओं में हिजाब पहनने वाली छात्राओं को अनुमति नहीं देने की घोषणा कर दी है। दुनिया में ऐसे शिक्षा मंत्री विरले ही होंगे, जो शिक्षा से वंचित करने के रास्ते ढूंढते है।

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इसी बीच जिस गुजरात की द्वारका में कृष्ण ने अपने जीवन के सबसे कठिन और कष्टप्रद दुर्दिन काटे थे, उस गुजरात ने अपने स्कूली पाठ्यक्रमों में उनकी गीता पढ़ाना अनिवार्य करने की घोषणा कर दी है। जल्द ही ‘गीता शरणं गच्छामि’ वाले राज्यों की सूची में बाकी भाजपा शासित राज्यों के नाम भी जुड़े हुए दिखेंगे। यकीनन जैसा कि अन्यत्र भी और भी अनेकों ने कहा है, यह भारत राज्य के संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के स्वरुप से एकदम उलट है और इस प्रकार असंवैधानिक है। किसी धर्म विशेष से जुड़े ग्रन्थ को स्कूल में पाठ्यक्रम पढ़ाया जाना संविधान की समझदारी का ही विलोम है। मगर यहां सत्तासीन आरएसएस और उसकी राजनीतिक भुजा भाजपा गीता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की हरकत उसमें वर्णित कथित धार्मिक बातों को लोकप्रिय बनाने के लिए नहीं कर रही है – वह इसे दूसरे धर्मों के प्रति नफ़रत और इस प्रकार उनके विरुद्ध उन्माद फैलाने का जरिया बनाना चाहती है। मगर बात इसके अलावा भी है और यह अलावा गुणात्मक रूप से अलग दिशा की ओर प्रस्थान के घंटे घड़ियालों का बजना है।

जैसा कि अनेकों बार लिखा जा चुका है, फिर भी दोहराने में हर्ज नहीं कि मौजूदा सत्ता गिरोह का असली एजेंडा अल्पसंख्यक नहीं हैं, उनका वास्तविक लक्ष्य भारत में मध्ययुगीन समाज प्रणाली को स्थापित करना है। मुसलमान और बाकी अल्पसंख्यक तो सिर्फ लामबंदी के लिए निगाहों में रखे और दिखाए जाते हैं, असली निशाना तो बाकी की आबादी का वह 90 प्रतिशत है, जिसे हिन्दू कहा जाता है। गीता का उपयोग वे समय के पहिये को उलटा घुमाने की जंत्री के रूप में करना चाहते हैं।

पहली बात तो यह कि जिसे हिन्दू के रूप में संबोधित किया जाता है, गीता उसमें शामिल सभी समुदायों का मान्य ग्रन्थ नहीं है। असल में तो पृथ्वी के इस हिस्से के धार्मिक विकास के इतिहास की विशिष्टता ही यह है कि इसका कोई एक ग्रन्थ नहीं है। यदि वैदिक धारा को ही मान लें, तो वेद भी चार हैं। जिनमें सचमुच का तत्वज्ञान है, वे प्रमुख उपनिषद् भी 18 हैं ; जिनमें से अधिकांश एक दूसरे की धारणा से असहमत है, विरूद्ध हैं । कई तो ऐसे भी हैं, जो खुद ईश्वर के अस्तित्व पर ही सवाल उठाते हैं। वहीँ पूरब से दक्षिण तक हजारों पंथ, सम्प्रदाय, धाराएं ऐसी भी हैं, जो वेद ही नहीं मानती। गीता को सबसे ऊपर बैठाने की यह कोशिश धार्मिक विमर्श की इस व्यापकता और समावेशिता को सिकोड़ना है। अपेक्षाकृत आधुनिक सेमेटिक धर्मों की भौंड़ी नकल करना है।

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यह जिन्होंने गीता बोली और सुनाई, उन कृष्ण के कहे को भी न समझने की बात है। कृष्ण ने भी कहा था कि “धर्म वह है, जो परिस्थितियों और समय के हिसाब से बदलता रहता है – जो नहीं बदलता है, वह अधर्म है।”

दूसरी बात यह कि गीता न तो धर्मग्रन्थ है, ना ही किसी तरह का नया दर्शन है। गीता में दार्शनिक भाव उतना ही है, जितना एक विशेष प्रकार की सामाजिक प्रणाली को विधान के रूप में प्रस्थापित करने के लिए जरूरी होता है। इसमें धर्म उतना ही है, जितना असहनीय विभेदकारी यंत्रणाओं को ईश्वरेच्छा साबित करने और इस तरह नियति करार देकर स्वीकार्य बनाया जा सके। ठीक इसी वजह से यह नैतिक शिक्षा का पाठ नहीं बन सकती। गीता में कृष्ण की भूमिका मनु के बनाये अमानवीय ढाँचे का अनुमोदन करने और उसे धर्मसम्मत बताने भर की है।

गीता के श्लोक 4.13 में जब वे :
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्धयकर्तारमव्ययम्‌ ॥” कहते हैं, तब चारों वर्णों को अपने द्वारा रचे गए बताने के साथ यह भी साफ़ करते हैं कि “अब वे भी इसे बदल नहीं सकते।” अपरिवर्तनीयता का इससे ज्यादा मजबूत ठप्पा और क्या लगवाया जा सकता था! आगे के श्लोकों में वे इन चारों वर्णो की अलग-अलग विशेषतायें भी बताते हैं। यहां तक कि अपने वर्ण (और जाति) के अनुरूप काम न करने पर या अपनी स्थिति के प्रति असहमति या विरोध करने पर गंभीर परिणामों का भय भी दिखाते हैं। वे यही तक नहीं रुकते, शास्त्रसम्मत आचरण करना ही जीवन का लक्ष्य बताते हैं ; कहने की जरूरत नहीं कि शास्त्रों में अलग-अलग वर्णों के लिए किस तरह के आचरण निर्धारित किये गए हैं। मनुस्मृति इस कोड ऑफ़ कंडक्ट का सबसे आधिकारिक शास्त्र है। इसी की भाषा में बोलते हुए गीता महिलाओं पर भी मेहरबान होती है और उन्हें पाप के गर्भ से पैदा हुयी बताती है।

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गुजरात के शिक्षा मंत्री का दावा है कि गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करना छात्रों को नैतिक शिक्षा देने के उद्देश्य से किया जा रहा है। ऊपर लिखे और इस जैसे ही अनेक और श्लोकों से, बाकी धर्म मानने वालों की बात छोड़िये, व्यापक तौर से हिन्दू समुदाय में आने वाले छात्र-छात्राये किस तरह की नैतिक शिक्षा पाने वाले हैं? यही कि स्त्री और शूद्र और वैश्य पाप के गर्भ से जन्मे हैं? यही कि मनुष्य का कर्तव्य है कि संविधान में लिखे के अनुरूप नहीं, हजारों साल पुराने शास्त्रों में जैसा लिखा है, वैसा आचरण करना? यही कि किसी भी तरह के बदलाव या सुधार के बारे में सोचना तक बंद कर देना? असली नीयत का एक पहलू यह है। संविधान की जगह मनुस्मृति की प्राणप्रतिष्ठा कराने का माध्यम बनाई जा रही है गीता।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।”
“कर्म किये जाओ, फल की कभी कोई इच्छा न करो” का गीता का खूब प्रचारित किया गया श्लोक शासक वर्गों के लिए जैकपॉट से कम नहीं है। उन्हें ऐसा ही समाज चाहिए, जहां लोग अधिकारों की बात न करें। जहां अपनी मेहनत का भुगतान मांगना निषिद्ध और दण्डनीय अपराध हो। इस श्लोक को पढ़कर विद्यार्थी क्या नैतिक शिक्षा लेंगे – यही ना कि मन लगाकर पढ़ने के बाद ज्ञान-व्यान हासिल करने की इच्छा रखना ही गलत है? पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी या रोजगार की उम्मीद तो बिलकुल ही मत करो।

यह भाजपा सरकार की नई शिक्षा नीति पर अमल का एक हिस्सा है। इसमें जिस “अपनी सांस्कृतिक विरासत पर अभिमान” करना सिखाने वाला पाठ्यक्रम जोड़े जाने की बात कही गयी है, गीता उसका आरम्भ है – मनुस्मृति उसका अगला अध्याय होगी। एकलव्य और शम्बूक, गार्गी – द्रौपदी और सीताओं के नित नए परिशिष्ट इसमें जुड़ते जाएंगे। यही पढ़ेगा भारत, तभी तो उनके जैसा बंद समाज बनेगा।

इस तरह की कोशिशें सिर्फ आज को नहीं बिगाडतीं, वे कल और उसके बाद के हजारों आगामी कल को दुश्वार बनाने की आशंका से भरी होती हैं। जरूरत इनसे भी ठीक उसी तेवर के साथ लड़ने की है, जिसे 28-29 मार्च की हड़ताल में भारत के मेहनतकशों ने दुनिया को दिखाया है।


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