जिंदा हु मै- जीते-जी अपनी तेरहवीं, 1900 लोगों को ‘भोज’ का न्योता, वजह सुनकर भर आएंगी आंखें, पढ़ें…

औरैया जिले में अकेलेपन ने एक इंसान को जीते जी अपनी ही तेरहवीं करने के लिए मजबूर कर दिया। क्षेत्र के लक्ष्मणपुर गांव के 65 वर्षीय राकेश यादव ने सोमवार को तेरहवीं संस्कार के रूप में भंडारा कराने का निर्णय लिया है। अविवाहित राकेश ने गांव-गांव करीब 1900 लोगों को निमंत्रण पत्र भी भेजे हैं।

तीन भाइयों में सबसे बड़े राकेश के छोटे भाई चंद्रपाल यादव की बीमारी से मौत हो चुकी है। दूसरे भाई नरेश यादव की हत्या कर दी गई थी। तीनों भाइयों की शादी नहीं हुई थी। परिवार में ऐसी घटनाएं उनके जीवन में ऐसा खालीपन छोड़ गईं, जिसे भर पाना उनके लिए संभव नहीं। उनकी एक विवाहित बहन भी है। 

अंतिम संस्कार या तेरहवीं करने वाला कोई नहींं
राकेश कहते हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर न तो कोई अपना साथ है, न ही भविष्य में उनके अंतिम संस्कार या तेरहवीं करने वाला कोई सहारा। यही चिंता धीरे-धीरे उनके भीतर गहराती गई और उन्होंने अपना तेरहवीं भोज कराने का निर्णय ले लिया। राकेश का कहना है कि उन्होंने अपना पैतृक घर भी एक रिश्तेदार को दान कर दिया है।

आयोजन भोज तक सीमित रहेगा, पिंडदान नहीं कराएंगे
वह अब एक साधारण मड़ैया में रहते हैं। उधर, जीते जी तेरहवीं भोज की खबर से गांव में चर्चा का माहौल है। कोई इसे राकेश का दुख मान रहा है, तो कोई इसे उनका अकेलेपन बता रहा है। सोमवार को पूरे गांव के लोग इस भंडारे में शामिल होंगे, तो चर्चा का माहौल एक बार फिर गर्म होगा। बताया कि आयोजन भोज तक सीमित रहेगा, पिंडदान नहीं कराएंगे।

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रिश्तेदारों पर भी नहीं भरोसा
राकेश का कहना है कि उसकी बहन विवाहित हैं। उनके दो बेटे व एक बेटी है। उनका कहना है कि बुढ़ापा आने पर न कोई उनकी देखभाल करेगा और न ही भोज कराएगा। उनके कई रिश्तेदार हैं, पर उन्हें किसी पर भरोसा नहीं है। वह हमेशा गांव में रहे और लोगों के तेरहवीं भोज में शामिल होते रहे। ऐसे में लगता है कि उनका भोज भी हो और गांव के लोग उसमें शामिल हों।

मिलती है वृद्धावस्था पेंशन
राकेश का कहना है कि उन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती है। उन्होंने वर्षोँ तक मेहनत-मजदूरी कर जो पैसा बचाया है, उसी का उपयोग 1900 लोगों के भोज में करेंगे।

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