राज्यसभा उपसभापति चुनाव:- लगातार तीसरी बार निर्विरोध चुने जाएंगे हरिवंश

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संसदीय राजनीति में हरिवंश नारायण सिंह एक बार फिर नया इतिहास रचने जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार, राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए वह लगातार तीसरी बार निर्विरोध चुने जाने की दहलीज पर खड़े हैं। राज्यसभा सचिवालय को उनके समर्थन में अब तक कुल पांच नोटिस प्राप्त हुए हैं, जबकि दिलचस्प बात यह है कि मुख्य विपक्षी खेमे की ओर से किसी भी उम्मीदवार का नामांकन दाखिल नहीं किया गया है।

विपक्ष ने किया चुनाव का बहिष्कार
भले ही हरिवंश की राह में कोई प्रतिद्वंद्वी खड़ा न हो, लेकिन सदन का सियासी तापमान बढ़ा हुआ है। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने इस पूरी प्रक्रिया के बहिष्कार का फैसला किया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि पिछले सात वर्षों से लोकसभा में उपाध्यक्ष का पद खाली रखना संसदीय परंपराओं का अपमान है। विपक्ष ने यह भी मुद्दा उठाया कि राष्ट्रपति की ओर से नामित सदस्य को राज्यसभा के उपसभापति पद के लिए चुनना इतिहास में पहली बार हो रहा है। रमेश ने उम्मीद जताई कि ‘हरिवंश 3.0’  विपक्ष की मांगों के प्रति अधिक उदार और संवेदनशील रहेंगे।

प्रस्तावों में दिखी एनडीए की एकजुटता
हरिवंश के पक्ष में सत्ता पक्ष ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। सदन के नेता जेपी नड्डा ने पहला प्रस्ताव पेश किया, जिसका समर्थन एस फांगनोन कोन्याक ने किया। दूसरा प्रस्ताव भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन की ओर से आया। इसके अलावा केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा और आरएलडी नेता जयंत चौधरी ने भी हरिवंश के नाम का प्रस्ताव दिया है। इन प्रस्तावों में शिवसेना के मिलिंद देवड़ा और आरएलएम के उपेंद्र कुशवाहा जैसे सहयोगी दलों के सदस्यों ने भी समर्थन जताया है।

नामांकित सदस्य के रूप में पहली बार इस पद पर बैठेंगे हरिवंश
हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से उच्च सदन के लिए मनोनीत किए जाने के बाद हरिवंश इस पद को संभालने वाले देश के पहले नामांकित सदस्य होंगे। इससे पहले वह जदयू के कोटे से सदन में थे, लेकिन इस बार पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की रिक्त हुई सीट पर उनकी सदन में वापसी हुई है।

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विपक्ष की खामोशी के मायने
संसदीय गलियारों में चर्चा है कि सत्ता पक्ष ने इस बार आम सहमति बनाने के लिए काफी पहले ही बिसात बिछा दी थी। सदन के नेता जेपी नड्डा ने विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं से संपर्क साधा था, जिसका परिणाम यह रहा कि करीब 70 सांसदों वाले ‘इंडिया’ गठबंधन ने कोई चुनौती पेश नहीं की। 140 से अधिक सांसदों वाले एनडीए गठबंधन के लिए यह एक बड़ी रणनीतिक जीत मानी जा रही है।


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