गढ़वाल में स्थित तुंगनाथ मंदिर का पवित्र इलाका जिसे तृतीय केदार कहा जाता है और चोपता की खूबसूरत घाटियां हर साल हज़ारों श्रद्धालुओं, ट्रेकर्स और प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर खींचती हैं। जहां कुछ सैलानी हिमालय के नजारे और बर्फ की चादर देखने आते हैं, वहीं कुछ लोग बाबा तुंगनाथ के मंदिर में आशीर्वाद पाने के लिए मुश्किल ट्रेकिंग करते हैं। लेकिन अब इस इलाके की प्राकृतिक सुंदरता फीकी पड़ रही है। इसकी वजह है इधर-उधर बिखरा प्लास्टिक कचरा और गंदगी।
हर साल करीब पांच से छह लाख लोग तुंगनाथ का दौरा हैं करते
चोपता घाटी हिमालयन मोनाल, थार और रेड फॉक्स जैसी प्रजातियों से समृद्ध है। इसे वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा प्राप्त है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की भारी भीड़ ने इन प्रजातियों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। स्थानीय लोगों और मंदिर के पुजारियों ने प्राकृतिक जैव-विविधता के नुकसान पर चिंता जताई है।
पर्यावरणविद ने सुझाए समाधान
पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी का कहना है कि ऐसी व्यवस्था बनानी होगी कि पर्यटक प्लास्टिक कचरा लेकर ही न जा सके। वह ट्रेक पर जाएंगे तो कचरा वहीं फेंकेंगे, उन्हें एकत्रित तो कर लेंगे लेकिन उनका शोधन कहां होगा। इसके लिए एक नियंत्रण प्रणाली लागू करनी होगी ताकि यात्रियों को जरूरत का सामान ट्रेक से पहले दिया जाए और वह इधर-उधर न फेंके। पर्यटकों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना होगा। साथ ही स्थानीय लोगों को इसमें योगदान देना होगा।







