देहरादून- तमक नाला में बारिश ज्यादा हुई या फटा बादल, वैज्ञानिक अध्ययन होगा, सचिव आपदा प्रबंधन ने भेजा पत्र

मोली जिले के ज्योतिर्मठ-मलारी मोटर मार्ग पर तमकनाला में 10 अगस्त को अचानक बढ़े जलप्रवाह और भारी मलबे की असली वजह अब वैज्ञानिक अध्ययन से सामने आएगी। आपदा प्रबंधन विभाग ने घटना के कारणों का पता लगाने के लिए प्रमुख वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों को पत्र भेजा है। विशेषज्ञ यह पता लगाएंगे कि जलप्रवाह सामान्य बारिश, अत्यधिक स्थानीय बारिश, बादल फटने, तीव्र सतही बहाव या किसी अन्य जल वैज्ञानिक कारण से बढ़ा।

विभाग ने वाडिया हिमालयी भू-विज्ञान संस्थान, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी), भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (आईआईआरएस), उत्तराखंड अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (यू-सैक), भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई), भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) के निदेशकों को पत्र भेजा है।

संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन जरूरी
वैज्ञानिक संस्थानों से तमकनाला के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र का अध्ययन कर अचानक बढ़े जलप्रवाह के वास्तविक स्रोत की पहचान करने को कहा गया है। साथ ही नाले में आए भारी मलबे के स्रोत और उत्पत्ति क्षेत्र का पता लगाने के अलावा ऊपरी क्षेत्र में भूस्खलन, भू-धंसाव, ढलान विफलता, चट्टानों के टूटने अथवा अन्य भू-आकृतिक गतिविधियों की भूमिका का परीक्षण भी किया जाएगा।

 

संभावित ग्लेशियर झील के जोखिम का भी आकलन होगा।सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने कहा कि ज्योतिर्मठ-मलारी मोटर मार्ग सीमावर्ती क्षेत्र से जुड़ा होने के साथ स्थानीय जनजीवन, आवागमन और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। ऐसे में घटना के कारणों और भविष्य के संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन जरूरी है।

 

15 दिनों में रिपोर्ट देने को कहा गया

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सचिव आपदा प्रबंधन सुमन ने संबंधित वैज्ञानिक संस्थानों से अपने-अपने विशेषज्ञता क्षेत्र के अनुसार अध्ययन व परीक्षण कर 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में प्राप्त वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर क्षेत्र में भविष्य के जोखिमों को कम करने एवं निगरानी तथा पूर्व चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक कदमों पर भी विशेषज्ञ सुझाव प्राप्त होंगे।

बारिश की तीव्रता और अवधि का होगा अध्ययन

सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन ने बताया कि वैज्ञानिक अध्ययन में घटना से पूर्व एवं घटना के बाद क्षेत्र की स्थिति के तुलनात्मक आकलन के लिए उपग्रह चित्रों, उच्च रिजॉल्यूशन रिमोट सेंसिंग, ड्रोन सर्वेक्षण एवं जीआईएस आधारित विश्लेषण सहित आधुनिक तकनीकों का उपयोग करने का अनुरोध किया गया है। संबंधित संस्थानों से क्षेत्र में संभावित भूस्खलन, रॉकफॉल, मलबा प्रवाह, फ्लैश फ्लड अथवा अन्य तीव्र भू-जलवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के प्रमाणों का वैज्ञानिक परीक्षण करने को कहा गया है।

 

अर्ली वार्निंग एवं रियल टाइम मॉनिटरिंग पर भी विशेषज्ञ राय

पत्र में क्षेत्र में अर्ली वार्निंग सिस्टम, रियल टाइम मॉनिटरिंग, वर्षामापी एवं जलस्तर सेंसर, कैमरा आधारित निगरानी अथवा अन्य आधुनिक निगरानी तंत्र स्थापित किए जाने की आवश्यकता के संबंध में भी विशेषज्ञ राय उपलब्ध कराने को कहा गया है।

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