राममंदिर चढ़ावा चोरी: दान देने के तरीके में बड़ा बदलाव, अब ये काम करने से बच रहे श्रद्धालु

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राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद श्रद्धालुओं की आस्था पर कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन उनके दान देने के तरीके में बड़ा बदलाव जरूर दिखाई देने लगा है। पड़ताल में सामने आया कि अब दानपात्र में पहले की तरह सोने-चांदी के आभूषण और बेशकीमती सिक्के लगभग दिखाई नहीं देते। मंदिर के भीतर चढ़ावा व्यवस्था से जुड़े कर्मचारियों से बातचीत और मौके पर मिली जानकारी इस बदलाव की पुष्टि करती है।

कुछ महीने पहले तक मंदिर में ऐसा दृश्य आम था कि श्रद्धालु दर्शन के दौरान भावुक होकर अपनी अंगूठी, चेन, झुमके, बाली, लॉकेट, कंगन, ब्रेसलेट या सोने-चांदी के सिक्के तक दानपात्र में अर्पित कर देते थे। चढ़ावा गणना के दौरान नोटों की छंटाई में अक्सर ये आभूषण निकलते थे, जिन्हें अलग सुरक्षित रखा जाता था।

 

अब कर्मचारियों का कहना है कि ऐसे चढ़ावे बेहद कम हो गए हैं। मंदिर परिसर में तैनात एक कर्मचारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि चोरी की घटना उजागर होने के बाद श्रद्धालु पहले की तरह दान तो कर रहे हैं, लेकिन अब अधिक सतर्क हैं।

 

बड़े नोटों की तुलना में छोटे नोट ज्यादा मिल रहे हैं और कीमती आभूषणों का दान लगभग न के बराबर रह गया है। उनके मुताबिक श्रद्धालु अब भावनाओं के साथ-साथ सावधानी को भी प्राथमिकता दे रहे हैं। वहीं कीमती आभूषण दान करने वालों का नाम, पता, आभूषण का आकार-प्रकार दर्ज करने की नई व्यवस्था बना दी गई। एक कर्मी तत्काल यह प्रक्रिया पूरी करेगा, पहले यह व्यवस्था नहीं थी।

 

पिछले 10 दिन में नहीं मिला आभूषण का चढ़ावा
चढ़ावा गणना से जुड़े एक अन्य कर्मी ने बताया कि पहले जब दानपात्र खोले जाते थे तो नोटों के बीच से सोने-चांदी के सिक्के और आभूषण मिलना सामान्य बात थी। अब कई-कई दिनों तक ऐसा कोई चढ़ावा नहीं मिलता। उनका कहना है कि यह बदलाव चोरी की घटना के बाद स्पष्ट रूप से महसूस किया जा रहा है। 

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पिछले 10 दिनों में दान पात्र में कोई भी बहुमूल्य आभूषण नहीं मिले हैं। चढ़ावा चोरी की घटना ने श्रद्धालुओं को यह सोचने पर मजबूर किया है कि भगवान को अर्पित किया जाने वाला उनका चढ़ावा पूरी तरह सुरक्षित हाथों तक पहुंचे। यही कारण है कि दानपात्र में सोना-चांदी के चढ़ावे अब पहले की तुलना में बहुत कम दिखाई दे रहे हैं।

 

बैंक अधिकारियों को भी संभालनी पड़ रही जिम्मेदारी
राम मंदिर में चढ़ावा गणना व्यवस्था अब सीमित कर्मचारियों के सहारे चल रही है। सूत्रों के अनुसार, 23 कर्मियों के एक साथ काम छोड़ने के बाद अब तक उनकी जगह नए लोगों की नियुक्ति नहीं हुई है। सूत्रों के मुताबिक कर्मचारियों की कमी के कारण पहले केवल निगरानी करने वाले बैंक अधिकारियों और प्रबंधकों को भी कई बार काउंटिंग में हाथ बंटाना पड़ रहा है। अब बैंक के वरिष्ठ अधिकारी भी नियमित रूप से काउंटिंग रूम का निरीक्षण करते दिखाई दे रहे हैं।

फिलहाल केवल 13 कर्मचारी ही रोज सुबह 10 बजे से शाम सात बजे तक चढ़ावे की गणना का कार्य संभाल रहे हैं। काउंटिंग कार्य से जुड़े एक कर्मी ने बताया कि पहले छह-छह घंटे की दो शिफ्टों में काम होता था, लेकिन अब एक ही लंबी शिफ्ट में काम कराया जा रहा है। काम का दबाव और समय दोनों बढ़ गए हैं, जबकि पारिश्रमिक में कोई वृद्धि नहीं हुई।

 

उनका दावा है कि थर्ड पार्टी एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मियों को करीब 15 हजार रुपये मासिक से अधिक भुगतान नहीं मिलता, जबकि भुगतान व्यवस्था को लेकर कर्मचारियों में लंबे समय से असंतोष है।
जितने दिन काम उतने दिन के पैसे
कर्मियों का कहना है कि चढ़ावा चोरी प्रकरण के बाद कार्यस्थल पर निगरानी और दबाव दोनों बढ़ गए हैं। वहीं घर लौटने पर भी परिवार और रिश्तेदारों के सवालों का सामना करना पड़ता है। कई कर्मियों का कहना है कि यदि कार्य परिस्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो आगे भी कुछ लोग नौकरी छोड़ सकते हैं। रविवार को गणना कर्मियों को छुट्टी दी गई है, लेकिन उस दिन के पैसे भी काटे जा रहे हैं। जितने दिन काम उतने दिन का ही पैसा मिल रहा है।
एसआईटी ने गोविंद देव गिरि की भूमिका भी खंगाली
राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण की जांच के दौरान गठित विशेष जांच दल ने केवल तत्कालीन महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र और गोपाल राव तक ही अपनी पड़ताल सीमित नहीं रखी, बल्कि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि की भूमिका और जिम्मेदारियों से जुड़े बिंदुओं की भी विस्तार से जांच की थी। सूत्रों के अनुसार जांच के दौरान एसआईटी ने उनके अयोध्या प्रवास और ट्रस्ट से जुड़े कार्यों की भी जानकारी जुटाई।
सूत्रों के मुताबिक एसआईटी की टीम अयोध्या धाम स्थित वैदेही भवन भी पहुंची थी, जहां स्वामी गोविंद देव गिरि अयोध्या प्रवास के दौरान ठहरते हैं। जांच टीम ने वहां के महंत और सेवादारों से पूछताछ कर यह जानकारी जुटाई कि वह किस कक्ष में ठहरते हैं। वहां उनकी किसी प्रकार की स्थायी व्यवस्था या संपत्ति है अथवा नहीं, और उनके प्रवास की प्रकृति क्या रहती है।
जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि एसआईटी यह भी परख रही थी कि ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष के रूप में गोविंद देव गिरि की प्रशासनिक और वित्तीय जिम्मेदारियां क्या थीं तथा चढ़ावा प्रबंधन की व्यवस्था में उनकी भूमिका किस सीमा तक थी। इसी क्रम में उनसे जुड़े विभिन्न तथ्यों का सत्यापन किया गया।
हालांकि, एसआईटी की इस पड़ताल में क्या निष्कर्ष निकले और अंतिम रिपोर्ट में गोविंद देव गिरि के संबंध में क्या टिप्पणी की गई है, इसका आधिकारिक खुलासा अभी नहीं हुआ है। फिलहाल सभी को एसआईटी की अंतिम जांच रिपोर्ट का इंतजार है।
लवकुश के निर्माणाधीन भवन मामले में सुप्रिया को सात दिन की मोहलत
राममंदिर चढ़ावा चोरी मामले के आरोपी लवकुश मिश्रा के निर्माणाधीन भवन को लेकर अयोध्या विकास प्राधिकरण (एडीए) की कार्रवाई फिलहाल जारी रहेगी। बुधवार को आरोपी की पत्नी सुप्रिया मिश्रा अपनी बेटी और पिता के साथ प्राधिकरण कार्यालय पहुंचीं। उन्होंने निर्माणाधीन भवन से संबंधित अभिलेख पूरे करने के लिए एक माह का समय देने का अनुरोध किया, लेकिन प्राधिकरण ने उन्हें केवल सात दिन की मोहलत दी है।
एडीए सचिव एवं विहित प्राधिकारी राजेश कुमार मिश्रा ने बताया कि सुप्रिया मिश्रा को कुछ दिनों का समय दिया गया है। इस अवधि में भवन से संबंधित सभी आवश्यक एवं वैध अभिलेख प्रस्तुत करने होंगे। यदि निर्धारित समय के भीतर दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। प्राधिकरण के अनुसार, बनबीरपुर (सहादतगंज) में सुप्रिया मिश्रा के नाम करीब 1024 वर्गफुट क्षेत्रफल में जी+1 भवन का निर्माण कराया जा रहा है। जांच में भवन का मानचित्र प्राधिकरण से स्वीकृत नहीं पाया गया।
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पहले जारी हो चुके हैं दो नोटिस
प्राधिकरण ने भवन को लेकर तीन जुलाई को पहला नोटिस जारी कर आवश्यक अभिलेख और स्वीकृत व शमन मानचित्र प्रस्तुत करने को कहा था। निर्धारित अवधि में नोटिस का विधिक जवाब और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर अंतिम नोटिस जारी किया गया। इसके बाद सुप्रिया मिश्रा स्वयं प्राधिकरण कार्यालय पहुंचीं और अतिरिक्त समय का अनुरोध किया।
सचिव राजेश कुमार मिश्रा ने बताया कि पूर्व में डाक के माध्यम से एक प्रार्थना पत्र मिला था लेकिन वह एडीए उपाध्यक्ष और जिलाधिकारी को संबोधित था। उसमें न तो नोटिस का विधिक उत्तर दिया गया था और न ही आवश्यक अभिलेख संलग्न थे। इसलिए उसे नोटिस का जवाब नहीं माना गया था। अब व्यक्तिगत रूप से समय मांगे जाने पर थोड़ी मोहलत दी गई है।
दस्तावेज नहीं दिए तो होगी कार्रवाई
प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि सात दिन के भीतर सभी आवश्यक अभिलेख, स्वीकृत अथवा शमन मानचित्र और अन्य पत्रावलियां प्रस्तुत करनी होंगी। ऐसा नहीं होने पर निर्माणाधीन भवन के विरुद्ध सीलिंग समेत अन्य वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। कार्यालय से बाहर निकलते समय सुप्रिया मिश्रा ने मीडिया से बातचीत नहीं की और बिना कोई प्रतिक्रिया दिए वहां से चली गईं।

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