अयोध्या पंचांग के अनुसार, आज पूर्णिमा श्राद्ध मनाया जा रहा है. भाद्रपद पूर्णिमा से ही पितरों के निमित्त श्राद्ध की शुरूआत हो जाती है. हालांकि, पितृपक्ष की मुख्य श्राद्ध तिथियों की शुरुआत 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध से होगी.इस दौरान लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध और दान-पुण्य करते हैं. श्राद्ध पक्ष में पितरों के लिए दीपक जलाने की भी परंपरा बताई गई है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपक को प्रकाश और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है. इसलिए शाम के समय पितरों के निमित्त दीपदान करने से जुड़ी कई मान्यताएं प्रचलित हैं.
पूर्णिमा श्राद्ध पर कितने दीपक जलाएं?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूर्णिमा श्राद्ध की शाम पितरों के नाम 16 दीपक जलाने की परंपरा मानी जाती है. 16 दीपक पितृपक्ष की 16 श्राद्ध तिथियों और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा से जोड़कर देखे जाते हैं. अगर घर में 16 दीपक जलाना संभव न हो, तो अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार दीपक जलाया जा सकता है.किस दिशा में जलाएं दीपक?
धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है. ऐसे में पितरों के निमित्त दीपक दक्षिण दिशा में रखने की परंपरा कई जगह देखने को मिलती है. शाम के समय घर की साफ जगह पर दीपक जलाकर पितरों का स्मरण किया जा सकता है. दीपक जलाते समय मन में अपने पूर्वजों का ध्यान करें और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें.
पूर्णिमा श्राद्ध से क्या है पितृपक्ष का संबंध?
भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों की शुरुआत से जुड़ा है. इसके बाद आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से मुख्य पितृ पक्ष की श्राद्ध तिथियों का क्रम चलता है. इस दौरान जिस तिथि पर किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, उसी तिथि के अनुसार उनका श्राद्ध करने की परंपरा है. पितृपक्ष के दौरान तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और जरूरतमंद लोगों को दान करने जैसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं. मान्यता है कि इन कार्यों को श्रद्धा के साथ करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है.पितृपक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, ब्राह्मण भोजन और दान-पुण्य करने से उन्हें शांति मिलने की कामना की जाती है. माना जाता है कि श्रद्धा से किए गए इन कर्मों से पितरों का आशीर्वाद मिलता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है. पितृपक्ष में दान करना, जरूरतमंदों को भोजन कराना और पूर्वजों का याद करना शुभ माना गया है. यह समय केवल कर्मकांड का ही नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान जताने का अवसर भी माना जाता है.







