कैलाश मानसरोवर यात्रा पांच साल बाद फिर शुरू हुई, तो मन में सबसे बड़ा सवाल यह था कि महामारी और बदली हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच क्या यह यात्रा आज भी उतनी ही सम्मोहक होगी, जितनी दशकों से सुनता आया था। लौटकर समझ आया कि रास्ते बदल सकते हैं, सुविधाएं बढ़ सकती हैं, पर कैलाश तक पहुंचने की सबसे कठिन चढ़ाई आज भी मनुष्य के भीतर ही है।
यात्रा का पहला पड़ाव राक्षस ताल था। हिमालय की गोद में बसी वह झील, जिसे लोकमान्यता रावण की तपस्थली मानती है। सदियों से यात्री झील के किनारे छोटे-छोटे पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर छोटी-सी मीनार बनाते हैं। इसे सौभाग्य, मन्नत और शुभ यात्रा का प्रतीक माना जाता है। उस क्षण लगा कि हर सभ्यता ने मनुष्य को अपनी आस्था और अपनी कामना टिकाने की कोई-न-कोई विधि दी है। शायद कैलाश की असली यात्रा भी यहीं से शुरू होती है।
कैलाश की अध्यात्मिक यात्रा में राक्षस ताल से आगे यमद्वार है…नाम सुनते ही मृत्यु का विचार आता है, लेकिन वहां आभास है कि यह अंत नहीं, परिवर्तन का द्वार है। यहीं से 52 िकमी लंबी परिक्रमा का वास्तविक संघर्ष शुरू होता है। डोलमा पास की 18,600 फीट ऊंची चढ़ाई पर शरीर अपनी सीमाएं याद दिलाता है। वहां न कोई अमीर रहता है, न गरीब। सब केवल यात्री रह जाते हैं। एक बुजुर्ग दंपती वर्षों से यात्रा के शुरू होने का इंतजार कर रहे थे। एक युवा इंजीनियर ने हांफते हुए इसे कॉरपोरेट जीवन का ब्रेक नहीं, जिंदगी का रीसेट बटन बताया। एक डॉक्टर ऑक्सीजन की कमी से जूझते हुए भी हर पड़ाव पर दूसरों की नब्ज टटोलता रहा। और एक बुजुर्ग मां अपने दिवंगत बेटे की अधूरी इच्छा पूरी करने थरथराते कदमों से कैलाश पहुंची। उनकी आंखों में दुख था, लेकिन उससे कहीं बड़ा संतोष। फिर वह क्षण आया, जिसका इंतजार हर यात्री करता है। धुंध धीरे-धीरे छंटी और पहली बार कैलाश का शिखर सामने आया। आश्चर्य पर्वत की विशालता नहीं थी, वह मौन था, जो सैकड़ों लोगों के बीच एकसाथ उतर आया। शायद कुछ दृश्य इतने विराट होते हैं कि उनके सामने भाषा स्वयं पीछे हट जाती है।
यहां पर्वत नहीं, मनुष्य बदलता है
राक्षस ताल से कुछ दूर मानसरोवर है। वही हिमालय, वही आकाश, वही हवा, लेकिन वातावरण बिल्कुल अलग। उस निर्मल जल के सामने बैठकर लगता है कि प्रकृति कभी-कभी मनुष्य के भीतर भी एक सरोवर बना देती है, जहां विचारों का शोर थम जाता है और शब्दों की जगह मौन बोलने लगता है।
बदले रास्ते, लेकिन यात्रा का अर्थ नहीं
- इस बार यात्रा में बदलाव साफ दिखाई दिया। भारत व चीन, दोनों ओर बुनियादी ढांचा पहले से बेहतर मिला। सड़कें अधिक व्यवस्थित हैं, पड़ाव सुविधाजनक हैं और ऊंचाई के अनुरूप शरीर को ढालने की वैज्ञानिक तैयारी पर खास ध्यान दिया जाता है। चिकित्सा सुविधाएं भी पहले से बेहतर हैं।
- पांच साल के अंतराल के बाद बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का लौटना केवल धार्मिक घटना नहीं, बल्कि भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक संपर्क के फिर सक्रिय होने का संकेत भी है। सुविधा ने शरीर की थकान भले कुछ कम कर दी हो, लेकिन अध्यात्म का मोल आज भी वैसा ही है।






