देश के परमाणु बिजलीघरों में किसी भी अप्रिय घटना की स्थिति में मुआवजे की अधिकतम सीमा को 3,000 करोड़ रुपये तय करने वाले 2025 के नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इसे एक बेहद संवेदनशील विधायी नीतिगत मुद्दा करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पांचोली की पीठ ने इस मामले पर चिंता व्यक्त की। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ शांति एक्ट, 2025 के विभिन्न प्रावधानों को चुनौती देने वाली यह याचिका सीधे तौर पर देश की आर्थिक नीति से जुड़ी हुई है।
नागरिकों की सुरक्षा बनाम आर्थिक नीति
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा, ‘हमारी मुख्य चिंता यह है कि यदि कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना या दुर्घटना होती है और किसी व्यक्ति को चोट या नुकसान पहुंचता है, तो क्या हमारे पास उस उद्देश्य के लिए एक मजबूत मुआवजा तंत्र मौजूद है।’ अदालत में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कुल देयता की सीमा तय किए जाने सहित तीन मुख्य मुद्दों पर चर्चा की। भूषण ने 2011 में जापान में हुए फुकुशिमा दाइची परमाणु ऊर्जा संयंत्र हादसे का हवाला देते हुए दलील दी, ‘यदि कोई परमाणु दुर्घटना होती है, तो उससे होने वाला नुकसान इस तय सीमा से सैकड़ों गुना अधिक होता है।’ उन्होंने कहा कि सरकार नीतिगत स्तर पर जो चाहे कर सकती है, लेकिन वह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बलि नहीं चढ़ा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने और क्या-क्या कहा?
बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने व्यावहारिक पहलुओं को सामने रखा। शीर्ष अदालत ने कहा कि परमाणु ऊर्जा के लिए तकनीक बाहर से आनी है। अगर देयता की कोई सीमा तय नहीं होगी, तो भारत में काम करने के लिए कौन आगे आएगा। कोर्ट ने यह भी भरोसा जताया कि यदि ऐसी कोई अप्रिय घटना होती है, तो राज्य सरकार भी पीड़ितों को मुआवजा देगा।
पीठ ने स्पष्ट किया कि देयता की सीमा तय करने से पीड़ितों को मुआवजा देने की अदालत या ट्रिब्यूनल की शक्तियों पर कोई असर नहीं पड़ता है। अदालत ने पूछा कि क्या दुनिया का कोई ऐसा विकसित या विकासशील देश है, जो परमाणु ऊर्जा से बिजली का उत्पादन नहीं कर रहा है? इस पर भूषण ने जवाब दिया कि जापान और जर्मनी जैसे देशों ने परमाणु संयंत्र बंद कर दिए हैं और वहां देयता की कोई सीमा नहीं है। अमेरिका में यह सीमा 1.54 लाख करोड़ रुपये है, जो भारत से 100 गुना अधिक है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह एक्ट विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को सुरक्षा मानकों में कोताही बरतने की छूट देता है।
पुराने कानून को बदलने पर उठा विवाद
इससे पहले 27 फरवरी की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मुख्य विवाद एक वास्तविक, दृश्यमान राष्ट्रीय हित बनाम एक दुर्भाग्यपूर्ण काल्पनिक नुकसान के बीच है। प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यह अधिनियम 2010 के ‘सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट’ को बदला है। यह निजी कंपनियों को परमाणु संयंत्र लगाने की अनुमति तो देता है, लेकिन उन्हें 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी से मुक्त करता है।
याचिका के अनुसार, 1986 के चेरनोबिल और 2011 के फुकुशिमा हादसों में 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ था। यह नया कानून 1987 के ओलियम गैस रिसाव मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित ‘पूर्ण उत्तरदायित्व’ के सिद्धांत के खिलाफ जाता है। पुराना कानून ऑपरेटर को सप्लायर के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार देता था, जिसे नए कानून में खत्म कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट अब इस गंभीर मामले की विस्तृत सुनवाई जुलाई में करेगा।









