हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुए एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध घोषित कर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय व्यक्ति को लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए थे।
कोर्ट ने इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन मानते हुए यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का हर्जाना लगाया। कोर्ट ने सरकार को यह राशि चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को भुगतान करने का निर्देश दिया है। साथ ही सरकार को दोषी अधिकारियों से इसकी वसूली करने की छूट भी दी है।
जस्टिस अब्दुल मोईन और जस्टिस
प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह फैसला उन्नाव में गिरफ्तार मनोज कुमार की ओर से उसके पुत्र मुदित द्वारा दाखिल याचिका पर दिया। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य है कि गिरफ्तारी के आधार लिखित में दिए जाएं।
दरअसल, मनोज कुमार को 27 जनवरी 2026 को थाना असीवन, जिला उन्नाव में दर्ज एक मुकदमे के संबंध में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के कारण वाले कॉलम में केवल मुकदमे की अपराध संख्या दर्ज थी। इसके बाद 28 जनवरी को मजिस्ट्रेट ने आरोपी की रिमांड मंजूर कर ली।
याचिकाकर्ता ने अपनी गिरफ्तारी और हिरासत को हाईकोर्ट में चुनौती दी और तर्क दिया कि उसे गिरफ्तारी के आधार लिखित में नहीं बताए गए, जो एक अनिवार्य संविधानिक सुरक्षा का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हाए रिमांड आदेश रद्द कर दिया और कहा कि यदि व्यक्ति किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए। साथ ही सरकार को दोषी अधिकारियों से हर्जाने की वसूली करने की छूट दी है।







