दिल्ली में नहीं है कोई गांव: कागजों में सभी बन चुके शहर, 63 साल में 352 का कायाकल्प, पर मूलभूत सुविधाएं नदारद

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राजधानी में अधिकारिक रूप से एक भी गांव नहीं बचा है। हाल ही में 48 गांवों को शहरीकृत घोषित किए जाने के साथ ही दिल्ली के सभी 352 गांव शहरीकृत श्रेणी में शामिल हो गए हैं। एमसीडी ने आठ चरणों में यह प्रक्रिया पूरी की है। हालांकि छह दशक से अधिक समय तक चली इस प्रक्रिया के बावजूद अधिकांश गांवों की तस्वीर आज भी नहीं बदली है और ग्रामीणों को शहर जैसी मूलभूत सुविधाओं का इंतजार है।

 

दिल्ली में गांवों को शहरीकृत घोषित करने की शुरुआत पहले मास्टर प्लान के लागू होने के बाद वर्ष 1963 में हुई थी। उस समय 19 गांवों को शहरीकृत गांव का दर्जा दिया गया था। उसके तीन वर्ष बाद 1966 में 72 और गांवों को इस श्रेणी में शामिल किया गया। जबकि दूसरे मास्टर प्लान के दौरान वर्ष 1982 में 24 गांवों को शहरीकृत घोषित किया, जबकि 1994 में 20 अन्य गांव इस सूची में जोड़े गए। तीसरे मास्टर प्लान और लैंड पुलिंग पॉलिसी लागू होने के बाद शहरीकरण की प्रक्रिया ने तेजी पकड़ी। वर्ष 2017 में 89 गांवों को शहरीकृत घोषित किया गया। उसके बाद 2019 में 79 और 2021 में एक गांव को यह दर्जा मिला। अब वर्ष 2026 में शेष बचे 48 गांवों को भी शहरीकृत घोषित कर दिया गया है। इस तरह दिल्ली में गांवों का अस्तित्व प्रशासनिक रूप से पूरी तरह समाप्त हो गया है।

छह दशक बाद भी नहीं बदली गांवों की हालत
पूर्व सांसद चौ. तारीफ सिंह के अनुसार गांवों को शहरीकृत घोषित करने का उद्देश्य उन्हें शहर जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना था, लेकिन अधिकांश गांव आज भी मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे हैं। कई गांवों में संकरी गलियां, अव्यवस्थित निर्माण, पार्किंग की समस्या, जल निकासी की कमी और खराब सड़कें आज भी बड़ी चुनौती हैं। वहीं पूर्व महानगर पार्षद रोहताश डबास ने बताया कि शहरीकरण के नाम पर गांवों में केवल कर और नियम लागू किए गए, लेकिन सुविधाएं नहीं पहुंचीं। अधिकांश गांवों में सीवर लाइन बिछाने के अलावा कोई बड़ा विकास कार्य नहीं हुआ। कई गांवों के चारो ओर पॉश कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं, लेकिन गांव खुद चहारदीवारी में घिरे हुए अलग-थलग क्षेत्र बनकर रह गए हैं।

नियम बढ़े, नहीं बनी अनुकूल व्यवस्था
गांवों के शहरीकृत होने के बाद वहां संपत्ति कर लागू हो गया है। साथ ही भवन उपनियम, मास्टर प्लान और डीडीए के प्रावधान भी लागू हो चुके हैं। इस कारण गांवों में मकान निर्माण और पुनर्निर्माण ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी बन गया है। ग्रामीणों का कहना है कि गांवों की पारंपरिक बसावट और संकरी गलियों को देखते हुए शहरी भवन उपनियम व्यवहारिक नहीं है। कई लोग अपने पुराने मकानों का निर्माण या मरम्मत भी आसानी से नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी ओर, गांवों में शहरी इलाकों की तरह व्यावसायिक गतिविधियों की भी पूरी अनुमति नहीं है, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ रहा है।

मास्टर प्लान और जमीनी हकीकत में अंतर
शहरी योजनाकारों का मानना है कि दिल्ली के गांवों को शहरीकृत घोषित करने की प्रक्रिया कागजों में तो पूरी हो गई, लेकिन जमीनी स्तर पर विकास नहीं हो सका। गांवों की ऐतिहासिक और सामाजिक संरचना को ध्यान में रखकर अलग विकास मॉडल तैयार नहीं किया गया। परिणामस्वरूप गांव न पूरी तरह ग्रामीण रह पाए और न ही आधुनिक शहरी क्षेत्र बन सके। दिल्ली पंचायत संघ के प्रमुख थान सिंह यादव का कहना है कि सरकार और संबंधित एजेंसियों को अब केवल शहरीकृत घोषित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गांवों के अनुरूप आधारभूत ढांचे, पार्किंग, सड़क, जल निकासी, सामुदायिक सुविधाएं और रोजगार के अवसर विकसित करने पर ध्यान देना चाहिए।

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