सुप्रीमकोर्ट की बड़ी टिप्पणी- वैवाहिक जिम्मेदारियों से लगातार इन्कार क्रूरता, तलाक का आधार’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर बिना किसी उचित कारण के पति या पत्नी लंबे समय तक वैवाहिक जिम्मेदारियों से इन्कार करते हैं, जिसमें शारीरिक संबंध भी शामिल है तो इसे क्रूरता माना जाएगा और यह हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक का वैध आधार हो सकता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ  ने अपने एक फैसले में कह कि वैवाहिक जीवन केवल कानूनी अधिकारों का संबंध नहीं है बल्कि यह आपसी सम्मान, विश्वास, भावनात्मक सहयोग और जिम्मेदारियों पर आधारित साझेदारी है।

 

पीठ ने कहा है, विवाह को, उसके कानूनी और सांविधानिक आयाम में, कभी भी केवल व्यक्तिगत अधिकारों के बीच एक संविदात्मक जुड़ाव तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह एक गहरा व्यक्तिगत और सामाजिक बंधन है जो आपसी सम्मान, साझा अपेक्षाओं और समान जिम्मेदारी पर आधारित है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वैवाहिक अधिकार और कर्तव्य अविभाज्य हैं। पीठ ने कहा है, अधिकारों की पूर्ति की मांग करना, जबकि जानबूझकर कर्तव्यों की पवित्रता को त्याग देना, इस संस्था के मूल सार को ही कमजोर करना है।

 

राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला बरकरार
शीर्ष अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें एक डॉक्टर पति को क्रूरता के आधार पर तलाक दिया गया था। पत्नी, जो पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं, ने हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

 

पति-पत्नी दोनों डॉक्टर 15 साल से रह रहे अलग
इस मामले में पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हैं। पति राजस्थान और पत्नी गुजरात में सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। दोनों की शादी दिसंबर 2007 में हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2 जून के फैसले में कहा कि दोनों पिछले 15 वर्षों से अधिक समय से अलग रह रहे हैं और उनके कोई संतान भी नहीं है। विभिन्न न्यायिक प्रयासों के बावजूद दोनों के बीच सुलह नहीं हो सकी। ऐसे में यह स्पष्ट है कि विवाह पूरी तरह टूट चुका है।

दोनों अलग-अलग कमरों में रहते थे, नहीं था संपर्क
पति का आरोप था कि साथ रहने के दौरान भी पत्नी अलग कमरे में सोती थीं, कमरे को अंदर से बंद कर लेती थीं, खटखटाने के बावजूद नहीं खोलती थीं। पत्नी ने इस तथ्य से इन्कार नहीं किया कि दोनों अलग-अलग कमरों में रहते थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय अदालतें पहले भी यह मान चुकी हैं कि शारीरिक निकटता से लगातार दूरी बनाना जीवनसाथी को भावनात्मक पीड़ा पहुंचाता है, विवाह की बुनियाद को कमजोर करता है।

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विचार भिन्न, साथ रहने की संभावना नहीं
दोनों पक्षों के बीच सुलह के कई प्रयास विफल रहे और उनके विचार इतने भिन्न हो चुके हैं कि साथ रहने की कोई संभावना नहीं बची है। पीठ ने माना कि यह विवाह पूरी तरह से टूट चुका है और केवल कागजों पर अस्तित्व में है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को समाप्त कर दिया।

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