राम मंदिर के पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो गई है। 5,300 से अधिक आवेदनों में से 16 उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया है। इस रेस में कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। चयन में केवल प्रशासनिक अनुभव ही नहीं, बल्कि नेतृत्व क्षमता, भीड़ प्रबंधन, धार्मिक-सामाजिक जुड़ाव और मंदिर की व्यवस्था को लेकर उम्मीदवार की सोच भी परखी जा रही है। सीईओ पद की रेस में तीन अधिकारी सबसे आगे चल रहे हैं, जिनमें पूर्व आईपीएस अफसर राजेश पांडेय, जौनपुर के पूर्व डीएम दिनेश चंद्र और अयोध्या के पूर्व डीएम योगेश्वर राम मिश्रा शामिल हैं। बाकी 15 नाम अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं।
पहले समझिए मामला क्या है?
राम मंदिर के लिए पूर्णकालिक सीईओ की नियुक्ति ऐसे समय हो रही है जब मंदिर में चढ़ावे में चोरी और गबन का मामला सामने आया। एसआईटी बनी, 25 जून को राम जन्मभूमि थाने में इस मामले में एफआईआर दर्ज हुई और आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे हुए। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी से स्टेटस रिपोर्ट मांगी और जांच को तेज, निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश दिए। इसके बाद एसआईटी का पुनर्गठन किया गया और वित्तीय जांच के लिए विशेषज्ञों को शामिल करने की बात सामने आई। इसी पृष्ठभूमि में मंदिर के प्रशासन और वित्तीय व्यवस्था में अधिक जवाबदेही लाने के लिए पूर्णकालिक सीईओ की तलाश शुरू हुई है।
कौन से चेहरे इस दौड़ में सबसे आगे?
राजेश पांडेय: पुलिस सेवा का लंबा अनुभव और 80 से ज्यादा एनकाउंटर
सीईओ पद के प्रमुख दावेदारों में पूर्व आईपीएस राजेश कुमार पांडेय हैं। वे उत्तर प्रदेश कैडर के 2003 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे हैं। हालांकि उनका पुलिस करियर आईपीएस बनने से पहले ही शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के जरिए 1986 में उनका चयन पीपीएस अधिकारी के रूप में हुआ और 21 फरवरी 1989 को उन्हें यूपी पुलिस में डीएसपी के पद पर तैनाती मिली। अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालने के बाद 2003 में वे आईपीएस अधिकारी बने। करीब 32 साल की सेवा के बाद 30 जून 2021 को वे आईजी-इलेक्शन सेल के पद से सेवानिवृत्त हुए। उनकी शैक्षणिक योग्यता एमएससी है।
पांडेय को पुलिस सेवा के दौरान एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर पहचान मिली। लखनऊ, अलीगढ़ और मेरठ में एसएसपी रहते हुए उन्होंने 80 से अधिक एनकाउंटर किए। वे उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और एंटी-टेररिस्ट स्क्वाड (ATS) के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। संगठित अपराध और आतंकवाद से निपटने के कई अभियानों में उनकी भूमिका रही। मोबाइल फोन के इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस में भी उन्हें विशेषज्ञता हासिल थी। उनके करियर की सबसे चर्चित कार्रवाई कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला के खिलाफ अभियान रही। श्रीप्रकाश शुक्ला पर कई हत्याओं में शामिल होने के आरोप थे। उसे बिहार के तत्कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद और पूर्वी उत्तर प्रदेश के माफिया वीरेंद्र कुमार शाही समेत कई लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार माना गया। उस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की साजिश रचने का भी आरोप था।
पांडेय को पुलिस सेवा के दौरान कई सम्मान मिले। 1999 और 2000 में उन्हें राष्ट्रपति का वीरता पुरस्कार मिला। 2007 में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी को मार गिराने के लिए उन्हें राष्ट्रपति का तीसरा वीरता पुरस्कार दिया गया। 2005 में उन्हें राष्ट्रपति का सराहनीय सेवा पुरस्कार मिला। इसके अलावा कोसोवो में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में सेवा के लिए उन्हें संयुक्त राष्ट्र पदक भी मिला। 2018 और 2020 में यूपी डीजीपी की सिल्वर कमेंडेशन डिस्क व 2021 में प्लेटिनम डिस्क से भी उन्हें सम्मानित किया गया।
सेवानिवृत्ति के बाद राजेश पांडेय को उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (UPEIDA) और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के लिए नोडल सुरक्षा अधिकारी नियुक्त किया। इसके बाद 2023 में उन्होंने पत्रकार और मीडिया-स्टडीज के प्रोफेसर राकेश गोस्वामी के साथ मिलकर अपनी पहली किताब ‘ऑपरेशन बाजूका’ लिखी।
दिनेश चंद्र: कई जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारी का अनुभव
सीईओ पद के दूसरे प्रमुख उम्मीदवार दिनेश चंद्र हैं। वे 2012 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश के कई महत्वपूर्ण जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। उनका जन्म 1966 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ। उनकी शैक्षणिक योग्यता एमएससी और एलएलबी है। प्रशासनिक करियर में उन्होंने अलीगढ़ के मुख्य विकास अधिकारी, गाजियाबाद नगर निगम के नगर आयुक्त और कानपुर देहात के जिलाधिकारी एवं कलेक्टर के रूप में काम किया। इसके बाद लखनऊ में संस्कृति विभाग के विशेष सचिव की जिम्मेदारी संभाली।
दिनेश चंद्र बहराइच और सहारनपुर के जिलाधिकारी भी रहे। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के औद्योगिक विकास एवं ग्राम्य विकास विभाग में विशेष सचिव के रूप में काम किया और 14 सितंबर 2024 से 4 मई 2026 तक जौनपुर के जिलाधिकारी एवं कलेक्टर रहे। 4 मई 2026 से वे लखनऊ में समाज कल्याण विभाग के विशेष सचिव के पद पर तैनात हैं। इस तरह उनके अनुभव में जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार के शासन स्तर तक की जिम्मेदारियां शामिल हैं।
योगेश्वर राम मिश्रा: अयोध्या प्रशासन का सीधा अनुभव
तीसरा प्रमुख नाम योगेश्वर राम मिश्रा का है। वे 2005 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी और अयोध्या के पूर्व जिलाधिकारी हैं। उनका जन्म 1964 में हुआ और उनका गृह जिला इलाहाबाद, अब प्रयागराज है। उन्होंने 1988 में सरकारी सेवा में प्रवेश किया और 2013 में आईएएस अधिकारी बने। उनकी शैक्षणिक योग्यता में एमए दर्शनशास्त्र और एमए डेवलपमेंट स्टडीज समेत अन्य योग्यताएं दर्ज हैं।
योगेश्वर राम मिश्रा बाराबंकी और वाराणसी के भी जिलाधिकारी रह चुके हैं। उन्होंने 2016 में अयोध्या के डीएम के रूप में काम किया। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग और लोक निर्माण विभाग में विशेष सचिव की जिम्मेदारी संभाली। 2019-20 में वे निर्वाचन विभाग में विशेष सचिव और एसीईओ भी रहे। आगे उन्होंने 2021-22 में मिर्जापुर मंडल, 2022-23 में बस्ती मंडल और 2023-24 में गोंडा मंडल के मंडलायुक्त के रूप में काम किया।
मिर्जापुर में विंध्याचल मंडल के मंडलायुक्त रहते हुए योगेश्वर राम मिश्रा को विंध्य धाम तीर्थ विकास परिषद का अतिरिक्त प्रभार भी मिला था। उनके नेतृत्व में विंध्य धाम कॉरिडोर के लिए भूमि अधिग्रहण का काम रिकॉर्ड समय में पूरा किए जाने की बात सामने आई। तमाम अवरोधों के बावजूद योजना के लिए जमीन की खरीद प्रक्रिया पूरी की गई और 1 अगस्त 2021 को विंध्य धाम कॉरिडोर का शिलान्यास हुआ।
इस लिहाज से उनके पास जिला प्रशासन, शासन और मंडल स्तर पर काम करने का लंबा अनुभव है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अयोध्या का प्रशासन पहले संभाल चुके हैं, इसलिए उन्हें धार्मिक पर्यटन, सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के प्रबंधन की जमीनी समझ का अनुभव रहा है।
इंटरव्यू में पूछे जा रहे किस तरह के सवाल?
चयन समिति ने उम्मीदवारों के लिए 34 सवालों वाला इंटरव्यू प्रारूप तैयार किया है। इसमें प्रशासनिक और नेतृत्व क्षमता के साथ मंदिर से जुड़े विषयों पर भी सवाल शामिल हैं। उम्मीदवारों से पूछा जा रहा है कि उन्होंने पहले कितने बड़े आयोजनों को संभाला है, उनमें कितने लोग शामिल हुए, आयोजन कितने दिनों तक चला और उसमें उनकी भूमिका क्या थी। यह भी पूछा जा रहा है कि क्या उन्होंने अपने कार्यकाल में 1,000 से 5,000 या उससे अधिक कर्मचारियों का नेतृत्व किया है।
उम्मीदवारों से केवल प्रशासनिक या प्रबंधन क्षमता से जुड़े सवाल नहीं किए जा रहे हैं। चयन प्रक्रिया में धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के संचालन, भगवान राम के प्रति आस्था, हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों और मंदिर की व्यवस्थाओं को लेकर उम्मीदवार की सोच को भी परखा जा रहा है। उम्मीदवारों से यह भी पूछा गया कि वे चोटी रखते हैं या नहीं, जनेऊ पहनते हैं या नहीं और शाकाहारी हैं या मांसाहारी। शराब पीने से जुड़े सवाल के साथ यह भी पूछा गया कि वे खुद को ‘कट्टर हिंदू’ मानते हैं या केवल आस्था रखते हैं। धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुरूप पहनावे और धार्मिक-सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी के बारे में भी सवाल किए गए।
इसके अलावा उम्मीदवारों से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि वे राम मंदिर की व्यवस्थाओं को किस तरह बेहतर बनाएंगे। इंटरव्यू में भीड़ प्रबंधन, नेतृत्व क्षमता, बड़े आयोजनों को संभालने का अनुभव और मंदिर के लिए उनकी कार्ययोजना पर विशेष जोर दिया जा रहा है। चयन समिति ने आवेदकों से कम से कम 20 वर्ष का अनुभव मांगा था।
कैसे लिया जा रहा है इंटरव्यू?
सीईओ पद के लिए चयन प्रक्रिया में 16 शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया जा रहा है। मंगलवार को 10 उम्मीदवारों का इंटरव्यू हुआ। साक्षात्कार बंद कमरे में ‘ग्रीन हाउस’ में हुआ और उम्मीदवारों को मीडिया से बात नहीं करने का निर्देश दिया गया। इंटरव्यू करीब 40 से 50 मिनट तक चलने की बात सामने आई है। उम्मीदवारों को पहले पूरे मंदिर परिसर का दौरा भी कराया गया।
कौन करेगा अंतिम फैसला?
सीईओ के चयन की पहली जिम्मेदारी तीन सदस्यीय समिति के पास है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल विष्णुकांत चतुर्वेदी और सुरेश हावड़े शामिल हैं। यही समिति 16 उम्मीदवारों के इंटरव्यू और उनके अनुभव के आधार पर तीन नामों का पैनल तैयार करेगी।
हालांकि समिति का काम अंतिम नियुक्ति करना नहीं है। तीन नामों का पैनल तैयार होने के बाद इन तीनों उम्मीदवारों का अंतिम इंटरव्यू श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट करेगा। इसके बाद ट्रस्ट की अंतिम मंजूरी से एक उम्मीदवार को राम मंदिर का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया जाएगा। नियुक्ति शुरुआती तौर पर तीन वर्ष के लिए होगी और प्रदर्शन के आधार पर इसे आगे बढ़ाया जा सकेगा।







