कुछ कहानियां पदकों से नहीं, फैसलों से लिखी जाती हैं। कुछ खिलाड़ी इतिहास जीतते हैं, लेकिन कुछ इतिहास बदल देते हैं। अनाहत सिंह की कहानी भी ऐसी ही है। आज पूरी दुनिया उन्हें विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियन के रूप में जानती है। कनाडा में उन्होंने फाइनल में मिस्र की दूसरी वरीयता प्राप्त रुकय्या सालेम को 11-3, 11-7, 11-9 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
इसके साथ ही वह विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। इतना ही नहीं, उन्होंने 15 वर्षों से इस प्रतियोगिता पर चले आ रहे मिस्र के एकछत्र राज का भी अंत कर दिया। लेकिन इस चमचमाते स्वर्ण पदक के पीछे एक छोटी-सी बच्ची का सपना छिपा है, जो स्क्वैश कोर्ट पर नहीं, बैडमिंटन कोर्ट पर शुरू हुआ था।
जब छह साल की बच्ची की आंखों में पीवी सिंधू बस गईं
जिंदगी ने पूछा- एक रास्ता चुनोगी?
टूर्नामेंट, यात्राएं, अभ्यास… दोनों खेलों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। आठ साल की उम्र में अनाहत ने शायद अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया। उन्होंने बैडमिंटन छोड़ दिया। जिस खेल से प्यार था, उसे अलविदा कहा। स्क्वैश को गले लगा लिया। यही वह पल था जिसने आगे चलकर भारतीय खेल इतिहास बदल दिया। कभी-कभी जिंदगी आपको वह नहीं देती जो आप चाहते हैं, बल्कि वह देती है जिसके लिए आप बने होते हैं।
बहन सिर्फ बहन नहीं, पहली कोच भी बनीं
रिकॉर्ड बनाना उनकी आदत बन गया
14 साल की उम्र… और दुनिया ने पहली बार नाम याद किया
साल 2022 में बर्मिंघम में राष्ट्रमंडल खेल हुए थे। अनाहत भारतीय दल की सबसे कम उम्र की खिलाड़ी रही थीं। उन्हें पहली बार सीनियर खिलाड़ियों के बीच उतरना था। बाद में उन्होंने स्वीकार किया कि वह इतनी घबराई हुई थीं कि पूरा दिन अपने कमरे से बाहर ही नहीं निकलती थीं। सिर्फ मैच खेलने के लिए बाहर आती थीं, लेकिन कोर्ट पर उतरते ही वही लड़की किसी और रूप में बदल जाती थी।उन्होंने अपना पहला मुकाबला जीत लिया। हार बाद में मिली, लेकिन दुनिया को यह एहसास हो गया कि भारत को अपना अगला बड़ा सितारा मिल चुका है। अनाहत ने दुनिया को बताया कि साहस का मतलब डर का खत्म हो जाना नहीं, बल्कि डर के बावजूद आगे बढ़ना है।
एशियन गेम्स ने बता दिया- यह शुरुआत है
2023 एशियाई खेलों में अनाहत ने दो कांस्य पदक जीते। महज 15 साल की उम्र में उन्होंने साबित कर दिया कि उम्र सिर्फ जन्म प्रमाण पत्र पर लिखी संख्या होती है। उनके साथी खिलाड़ी अभय सिंह ने कहा था, ‘लोग सोचते हैं कि 15 साल की लड़की को अनुभव चाहिए। लेकिन अनाहत पहले से ही एक फाइटर हैं।’ यही बात उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है।
21 साल का इंतजार… और फिर इतिहास
भारत 21 साल से उस दिन का इंतजार कर रहा था। 2005 में जोशना चिनप्पा विश्व जूनियर फाइनल तक पहुंची थीं, लेकिन खिताब नहीं जीत सकीं। फिर वर्षों तक कोई भारतीय उस ट्रॉफी के इतना करीब नहीं पहुंचा।इस बार अनाहत फाइनल में थीं। सामने मिस्र की खिलाड़ी थी। दुनिया जानती थी कि जूनियर स्क्वैश में मिस्र का दबदबा है, लेकिन शायद दुनिया यह नहीं जानती थी कि सपनों की कोई रैंकिंग नहीं होती। अनाहत ने पहला गेम जीता…फिर दूसरा…फिर तीसरा और जैसे ही आखिरी अंक मिला…भारत का 21 साल पुराना इंतजार खत्म हो गया। इतिहास सिर्फ लिखा नहीं गया। इतिहास मुस्कुराया।
अनाहत सिंह की जीत क्यों खास
- अनाहत सिंह जूनियर विश्व स्क्वैश चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं।
- फाइनल में उन्होंने मिस्र की दूसरी वरीय रुकय्या सालेम को 3-0 (11-3, 11-7, 11-9) से हराया।
- 18 वर्षीय अनाहत ने पूरे फाइनल में शुरुआत से अंत तक अपना दबदबा बनाए रखा।
- उन्होंने जोशना चिनप्पा के 2005 के उपविजेता प्रदर्शन को पीछे छोड़ते हुए भारत को पहला जूनियर विश्व खिताब दिलाया।
- अनाहत ने पूरे टूर्नामेंट में छह मैच खेले और सिर्फ दो गेम गंवाए, जो उनके शानदार प्रदर्शन को दर्शाता है।
- उन्होंने अभियान की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया की लिली विल्सन को सीधे गेमों में हराकर की।
- इसके बाद हॉन्गकॉन्ग की क्लो लो और मलयेशिया की डॉयस ली को हराकर क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई।
- क्वार्टर फाइनल में उन्होंने मिस्र की हबीबा रिज्क को 3-1 से मात दी।
- सेमीफाइनल में भी उन्होंने मिस्र की बार्ब सामेह को 3-1 से हराकर फाइनल का टिकट कटाया।
- फाइनल में सालेम को हराकर अनाहत ने 2011 से चले आ रहे मिस्र के लगातार जूनियर विश्व खिताब जीतने के सिलसिले को भी खत्म कर दिया।
- पिछले साल काहिरा में अनाहत ने कांस्य पदक जीतकर भारत का 15 साल का व्यक्तिगत पदक का इंतजार खत्म किया था, इस बार उन्होंने उसे स्वर्ण में बदल दिया।
आज पीवी सिंधू भी गर्व करेंगी
एक समय था जब अनाहत स्टैंड में बैठकर पीवी सिंधू को देखा करती थीं। आज हजारों बच्चियां अनाहत सिंह को देखकर अपने सपने बुनेंगी। यही किसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी जीत होती है। स्वर्ण पदक समय के साथ अलमारी में सज जाता है, लेकिन प्रेरणा…वह पीढ़ियों तक चलती है।
यह सिर्फ अनाहत की जीत नहीं है…
यह उस पिता की जीत है जिसने बेटी के सपनों पर भरोसा किया। उस मां की जीत है जिसने हर टूर्नामेंट में साथ खड़े होकर हौसला बढ़ाया। उस बहन की जीत है जिसने अपना अनुभव उसके लिए रास्ता बना दिया। और यह हर उस बच्चे की जीत है जिसे कभी जिंदगी ने कहा हो, ‘रास्ता बदलो।’ अनाहत की कहानी सिखाती है कि रास्ता बदलने से सपने नहीं बदलते। क्योंकि मंजिल उन लोगों को मिलती है जो हार नहीं मानते। कुछ लोग इतिहास पढ़ते हैं, कुछ लोग इतिहास लिखते हैं… और अनाहत सिंह ने महज 18 साल की उम्र में भारत के लिए इतिहास गढ़ दिया। शायद यही वजह है कि यह कहानी सिर्फ एक विश्व चैंपियन की नहीं, बल्कि एक ऐसे सपने की है जिसने अपना रास्ता बदला, लेकिन मंजिल नहीं।






