नलवाड़ी मेला: कभी होता था लाखों का कारोबार, अब पूजा में उधार के बैल

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बिलासपुर का ऐतिहासिक राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेला कभी उत्तर भारत के सबसे बड़े पशुधन मेलों में शुमार था। आज बदलते समय के साथ अपनी मूल पहचान खोता जा रहा है। करीब 137 वर्ष की विरासत समेटे यह मेला अब परंपरागत पशु व्यापार से हटकर सांस्कृतिक आयोजन बनकर रह गया है। आज स्थिति यह है कि बैलों की खरीद फरोख्त तो दूर पूजन के लिए भी बाहर से मंगवाने पड़ते हैं।

 

साल 1889 में तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी डब्ल्यू गोल्डस्टीन के शुरू किए गए इस मेले का उद्देश्य क्षेत्र में उच्च गुणवत्ता वाले पशुधन की उपलब्धता बढ़ाना था। यह मेला बैलों की खरीद-फरोख्त के लिए एक बड़े बाजार के रूप में विकसित हुआ और धीरे-धीरे बिलासपुर की सांस्कृतिक पहचान बन गया।

पुराने समय में यह मेला गोबिंद सागर झील में डूब चुके सांडू मैदान में होता था। 1960 के दशक में राजा के आदेशानुसार यहां मेला लगता था और दूर-दराज से व्यापारी इसमें हिस्सा लेने पहुंचते थे। पंजाब के रोपड़ और नवांशहर से व्यापारी ऊंटों पर सामान लादकर आते थे, जबकि रोपड़, नालागढ़ और बिलासपुर के ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों की संख्या में बैल यहां बिक्री के लिए लाए जाते थे।

भाखड़ा बांध के निर्माण के बाद सांडू मैदान जलमग्न हो गया और मेले को नए बिलासपुर के लुहणू मैदान में स्थानांतरित कर दिया गया। तब से यह मेला यहीं लगता है। स्थान परिवर्तन के साथ-साथ मेले के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव आया। पहले नगर पालिका द्वारा आयोजित होने वाला यह मेला बाद में राज्य स्तरीय घोषित हुआ और इसकी जिम्मेदारी जिला प्रशासन और सरकार ने संभाल ली।

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एक समय था जब नलवाड़ी मेले में लाखों के पशुधन का कारोबार होता था। बैलों की मंडी इस मेले की पहचान थी, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज मेले में नाममात्र के पशु ही लाए जाते हैं और वे भी खरीद-फरोख्त के लिए नहीं, बल्कि प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए पहुंचते हैं। यहां तक कि बैल पूजन के लिए भी बाहर से बैल मंगवाने पड़ते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार नलवाड़ी मेला अब अपनी मूल आत्मा से दूर होता जा रहा है। पशुधन व्यापार लगभग समाप्त हो चुका है और पारंपरिक गतिविधियां भी कम होती जा रही हैं। प्रशासन हर साल मेले को भव्य बनाने के प्रयास करता है, लेकिन यह प्रयास अधिकतर मनोरंजन और भीड़ जुटाने तक सीमित नजर आते हैं।

लोक संस्कृति से मनोरंजन मंच तक का सफर: पहले नलवाड़ी मेला लोक संस्कृति का जीवंत मंच हुआ करता था। छिंज (कुश्ती) और पारंपरिक लोक कार्यक्रम इसकी खास पहचान थे। स्व. गंभरी देवी, रोशनी देवी और संतराम चब्बा जैसे लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां लोगों को अपनी संस्कृति से जोड़ती थीं। दूर-दराज के गांवों से लोग इन कलाकारों को सुनने और देखने के लिए आते थे। यह मेला लोक जीवन और परंपराओं का जीवंत उदाहरण था।


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