होली 2026: शाहजहांपुर में ‘लाट साहब’ मांग रहे 21 हजार नजराना, जींस-शर्ट और जूते

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शाहजहांपुर में होली पर निकलने वाले ‘लाट साहब’ के जुलूस की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। रामपुर का युवक ही ‘लाट साहब’ बनेगा। उसने आयोजकों से 21 हजार रुपये नजराना, जींस-शर्ट और स्पोर्ट्स जूते मांगे हैं। शनिवार को यहां उसके पहुंचने की संभावना है। फिर उसकी खातिरदारी का दौर शुरू हो जाएगा।

 

होली पर लाट साहव बनने के लिए रामपुर के युवक व एक स्थानीय युवक ने संपर्क साधा था। आयोजक रामपुर वाले युवक को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। हालांकि, रिजर्व में स्थानीय युवक को भी रखा गया है। लाट साहब बनने वाले युवक को इनाम के तौर पर 21 हजार रुपये, कपड़े और जूते दिए जाएंगे। इसके साथ ही शराब की  बोतलें भी दी जाएंगी। आयोजकों के अनुसार, लाट साहब के आते ही शॉपिंग कराई जाएगी। बड़े लाट साहब जुलूस के आयोजक संजय वर्मा ने बताया कि लाट साहब को कमेटी के अलावा अन्य लोग भी उपहार देते हैं।

 

चौक कोतवाली और सदर बाजार थाने से भी मिलता है नजराना
बड़े लाट साहब का जुलूस चौक कोतवाली पहुंचता है तो वहां भी उसे नजराना दिया जाता है। परंपरा यह भी है कि कोतवाल लाट साहब को सलामी देकर विदा करते हैं। इसी तरह सदर बाजार थाने पर भी लाट साहब को नजराना देकर आगे की ओर रवाना किया जाता है।

सवारी की गई बुक 
बड़े लाट साहब की सवारी भैंसागाड़ी को बुक कर दिया गया है। शराब के साथ खूब खातिरदारी करने के बाद जूते-चप्पलों की माला पहनाकर भैंसागाड़ी पर सवार कराया जाएगा। 

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अंग्रेजों के जमाने से निकल रहा है जुलूस
शाहजहांपुर की होली अपने आप में अनोखी है। यहां पर अंग्रेजों के जमाने से लाट साहब का जुलूस निकाला जा रहा है। इतिहासकार डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि अपने अनूठे तरीके के लिए चर्चित लाट साहब के जुलूस का इतिहास काफी पुराना है। इसकी शुरुआत अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को खंडित करने के उद्देश्य से कराई थी। अंग्रेजों की शह पर ही तत्कालीन नवाब के अत्याचारों का बदला लेने के लिए इस जुलूस की शुरुआत हुई। आजादी के बाद इसका नाम बदलकर लाट साहब कर दिया गया।

डॉ. खुराना बताते हैं कि जिले में लाट साहब का जुलूस कब शुरू हुआ, इसकी निश्चित तारीख और वर्ष का तो पता नहीं चलता, किंतु यह तथ्य ऐतिहासिक है कि अवध क्षेत्र के प्रभाववश स्थानीय नवाब होली में प्रतिभाग करते थे। शाहजहांपुर के स्थानीय इतिहास पर लिखी गई किताबें यह बताती हैं कि नवाब होली के अवसर पर न केवल रंग खेलते थे, बल्कि जुलूस के रूप में नगर भ्रमण भी करते थे। वर्ष 1988 में तत्कालीन डीएम कपिल देव की सलाह पर जुलूस का नाम नवाब साहब की जगह लाट साहब का जुलूस कर दिया गया। इसका उद्देश्य प्रतीकात्मक रूप से अंग्रेजी शासन का विरोध करना हो गया।


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