दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रेस की स्वतंत्रता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता अहम है, लेकिन सोशल मीडिया युग में कई लोग बिना प्रशिक्षण और जवाबदेही के खुद को रिपोर्टर बताकर सनसनीखेज सामग्री बनाते हैं। अदालत ने विधायिका से ऐसे अनियंत्रित डिजिटल मीडिया के लिए उचित नियामक ढांचा बनाने का सुझाव भी दिया है।
मीडिया से हैं कहकर यूट्यूबर कर रहे थे रिकार्डिंग
मामला चार जुलाई 2025 का है, जब दो व्यक्ति (जो खुद को मीडिया से बताते हुए) सीमापुरी की अनाधिकृत कॉलोनी में रिकॉर्डिंग कर रहे थे। स्थानीय लोगों ने उन पर हमला कर दिया। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि भीड़ ने पीटा, मोबाइल, कैमरा बैटरी छीनी और मोटरसाइकिल क्षतिग्रस्त की। अदालत ने फैसले में कहा कि वीडियो फुटेज में आरोपियों की भूमिका स्पष्ट नहीं है।
मामला चार जुलाई 2025 का है, जब दो व्यक्ति (जो खुद को मीडिया से बताते हुए) सीमापुरी की अनाधिकृत कॉलोनी में रिकॉर्डिंग कर रहे थे। स्थानीय लोगों ने उन पर हमला कर दिया। एफआईआर में आरोप लगाया गया कि भीड़ ने पीटा, मोबाइल, कैमरा बैटरी छीनी और मोटरसाइकिल क्षतिग्रस्त की। अदालत ने फैसले में कहा कि वीडियो फुटेज में आरोपियों की भूमिका स्पष्ट नहीं है।
एक सुनवाई में जांच अधिकारी ने दावा किया था कि आबिद अली बस में घुसा लेकिन बाद में यह दावा गलत साबित हुआ। फुरकान के कपड़ों के रंग को लेकर भी जांच अधिकारी के बयानों में अंतर पाया गया। अदालत ने कहा कि टिप्पणियां केवल जमानत के संदर्भ में हैं और अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट सबूतों के आधार पर करेगा।






