हेल्थ अलर्ट: पैरों में होने वाला दर्द भी हो सकता है जानलेवा? 30 वर्षीय महिला के साथ हुई घटना ने चौंकाया

पैर और टखनों में दर्द, उंगलियों में सूजन जैसी समस्याएं बहुत कॉमन है। अक्सर लोग इसे थकान, मामूली चोट या दिनभर की ज्यादा मेहनत के कारण होने वाली दिक्कत मानकर इग्नोर करते रहते हैं, पर क्या आप जानते हैं कि कई बार ये छोटी सी दिखने वाली समस्या गंभीर और जानलेवा तक हो सकती हैं? कभी-कभी शरीर का यही छोटा-सा संकेत किसी ऐसे खतरे की शुरुआत हो सकता है, जो कुछ ही समय में फेफड़ों और दिल के लिए भी मुश्किलें बढ़ा देती है।

ऐसा ही कुछ 30 साल की उम्र में सारा बासरा के साथ हुआ। उनके पैरों में दर्द और उंगलियां लाल-गर्म रहती थीं। कुछ समय बाद उनका टखना सूज गया और तेज दर्द शुरू हो गया। उन्हें लगा कि शायद कोई एलर्जी है या पैर में चोट लगी है। अस्पताल में गईं तो इसे डॉक्टरों ने नेल पॉलिश से होने वाली एलर्जी बताया।
सारा को अंदाजा भी नहीं था कि आम सी दिखने वाली ये समस्या पैर की नस में खून का थक्का बनने का संकेत हो सकती है जो फेफड़ों तक पहुंच गई थी। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ये घटना बताती है कि ब्लड क्लॉट केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं है। पैर में सूजन, दर्द, गर्माहट जैसी दिक्कतें अगर लगातार बनी रहती हैं तो ये शरीर की तरफ से चेतावनी भी हो सकती है, जिसपर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

आखिर क्या है पूरा मामला?

ये मामला ब्रिटेन का है, स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं सभी लोगों को इस घटना से सीख लेने की जरूरत है। स्थानीय मीडिया में प्रकाशित इस रिपोर्ट ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों को डीप वेन थ्रोम्बोसिस (डीवीटी) जैसी समस्या के बारे में एक बार फिर से सोचने को मजबूर कर दिया है।

30 वर्षीय सारा बासरा के पैर में कुछ दिनों से अचानक सूजन और तेज दर्द बढ़ गया था, उन्हें लगा कि शायद टखने में चोट लग गई है। पर सारा को बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि ये लक्षण एक ऐसी गंभीर बीमारी की शुरुआत थी, जो आगे चलकर उनकी जान के लिए खतरा बन सकती थी।

  • सबसे पहले सारा ने देखा कि उनके पैर की उंगलियां लाल हो रही हैं और उनमें गर्माहट महसूस हो रही है। कुछ ही समय बाद यह समस्या टखने तक पहुंच गई।
  • टखना सूज गया और इसके साथ दर्द और जलन भी बढ़ने लगी।
  • सारा ने अलग-अलग डॉक्टरों को दिखाया, हर बार डॉक्टरों ने इसकी अलग-अलग वजह बताई गई।
  • पहली बार डॉक्टर को लगा कि यह नेल पॉलिश से हुई एलर्जी हो सकती है। पर नेल पॉलिश लगाना बंद करने के बाद भी जब दिक्कत ठीक न हुई तो अगल बार डॉक्टर ने सोचा शायद ये प्लांटर फैसियाइटिस है, जिसमें खासकर एड़ी और पैर के बीच के हिस्से में दर्द होता है।
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हार्ट अटैक जैसे लक्षण

एक दिन सारा एक म्यूजिक फेस्टिवल में गई थीं। वहां अचानक उनके सीने में दर्द और सांस लेने में परेशानी होने लगी। थोड़ी देर बाद अचानक वह गिर पड़ीं। लोगों को लगा शायद उन्हें हार्ट अटैक हो रहा है। उन्हें अस्पताल के इमरजेंसी विभाग ले जाया गया। वहां जांच में पता चला कि उनके पैर की गहरी नस में डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी डीवीटी हो गया था।

 

आसान भाषा में समझें तो डीवीटी में शरीर के अंदर किसी नस में खून का थक्का बन जाता है। यह थक्का पैर में समस्याओं के साथ कई बार फेफड़ों में भी पहुंच सकता है।

दूसरी स्कैन जांच में पता चला कि खून का यह थक्का पैर से निकलकर फेफड़ों तक पहुंच गया था और वहां एक धमनी में रुकावट पैदा कर चुका था। इस समस्या को पल्मोनरी एम्बोलिज्म  कहते हैं। यह एक गंभीर और जानलेवा स्थिति हो सकती है, क्योंकि इससे फेफड़ों तक खून का प्रवाह अचानक प्रभावित हो जाता है।

 

 

एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम थी असली वजह

सारा को बीमारी की असली वजह का पता कई महीने बाद चला। उन्हें एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम (एपीएस) था, जिसे ह्यूज सिंड्रोम भी कहा जाता है।

  • यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम से जुड़ी एक बीमारी है।
  • इसमें खून सामान्य से ज्यादा आसानी से थक्का बनाने लगता है। इसमें खून जरूरत से ज्यादा चिपचिपा होकर जमने लगता है।
  • इससे शरीर में खतरनाक ब्लड क्लॉट बनने का खतरा बढ़ जाता है। यह बीमारी गर्भावस्था के दौरान भी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है और बार-बार गर्भपात का कारण बन सकती है।
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स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, पैरों में बनने वाले खून के थक्के के कारण आमतौर पर सूजन-दर्द या छूने पर संवेदनशीलता या त्वचा के लाल पड़ने की दिक्कत होती है। अगर खून का थक्का पैर से निकलकर फेफड़ों तक पहुंच जाए तो स्थिति मेडिकल इमरजेंसी बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कम उम्र में होने वाले इस तरह के मामलों के पीछे भी एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम एक कारण हो सकती है।
अनुमान के मुताबिक, 50 साल से कम उम्र में होने वाले करीब छह में से एक स्ट्रोक, डीवीटी और हार्ट अटैक के मामलों में यह बीमारी मौजूद हो सकती है। लेकिन चिंता की बात ये है कि एपीएस की पहचान अक्सर समय पर नहीं हो पाती।

 

क्या कहती हैं विशेषज्ञ?

एपीएस की विशेषज्ञ और थ्रंबोसिस यूके की संस्थापक प्रोफेसर बेवर्ली हंट कहती हैं, खून के थक्के कई बार इसलिए पकड़ में नहीं आते क्योंकि डॉक्टर उनके लक्षणों में पुराने और एक जैसे पैटर्न की तलाश करते हैं। करीब 80 प्रतिशत डीवीटी के मामलों में पैर वैसा बहुत ज्यादा सूजा हुआ नहीं दिखता, जैसा आमतौर पर डॉक्टरों को किताबों में सिखाया जाता है। इसलिए बिना किसी स्पष्ट वजह के पैर में दर्द, टखने या पैर की उंगलियों में सूजन होने पर भी कई लोगों को वापस भेज दिया जाता है।

एपीएस आनुवांशिक यानी परिवार में चलने वाली बीमारी भी हो सकती है। कुछ लाइफस्टाइल फैक्टर, जैसे खराब खान-पान, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि न करना और धूम्रपान भी इस तरह की समस्या का खतरा बढ़ा सकते हैं।

अगर बीमारी की पहचान समय पर हो जाए तो इसे दवाओं से काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। गर्भवती महिलाओं को जरूरत के अनुसार ब्लड थिनर इंजेक्शन दिए जा सकते हैं।

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स्रोत:
Patients with DVT and primary antiphospholipid syndrome have worse obstetric outcomes than pregnant women with DVT and negative antiphospholipid antibodies: a retrospective cohort study

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