वैज्ञानिकों के अध्ययन में खुलासा- दोगुना माइक्रोप्लास्टिक निगल रहे हैं दिल्ली-एनसीआर वाले..

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दिल्ली की हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक अब सेहत के लिए गंभीर संकट बन रहे हैं। पुणे स्थित भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की ओर से किए गए ताजा अध्ययन में खुलासा हुआ है कि गर्मियों में दिल्ली और एनसीआर के लोग सर्दियों की तुलना में करीब 97% अधिक माइक्रोप्लास्टिक कण सांस के जरिए शरीर में ले रहे हैं। यह खतरा वयस्कों के साथ बच्चों और यहां तक कि शिशुओं तक पर मंडरा रहा है।

शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने बताया कि अप्रैल-जून के महीनों में दिल्ली की हवा में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा अचानक बढ़ जाती है।गर्मियों में बारिश कम और धूल ज्यादा उड़ती है। तेज गर्मी और कम नमी की वजह से प्लास्टिक जल्दी टूटकर छोटे टुकड़ों में बदलता है। ये सूक्ष्म कण लंबे समय तक हवा में तैरते रहते हैं और सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। दिल्ली-एनसीआर में हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक का विश्लेषण और स्वास्थ्य पर प्रभाव नामक इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं।

वयस्क, बच्चे और शिशु कौन कितना निगल रहा दिल्ली की हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक का असर हर आयु वर्ग पर अलग-अलग दर्ज किया गया है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया कि आंकड़े  (प्लस/माइनस) के साथ दिए गए हैं। इसका मतलब है कि वास्तविक संख्या औसत से थोड़ी ऊपर या नीचे हो सकती है।  अध्ययन के मुताबि,  दिल्ली के वयस्क लोग गर्मियों में सर्दियों की तुलना में लगभग दोगुना माइक्रोप्लास्टिक निगल रहे हैं। सर्दियों में औसतन 10.7 कण 3.8 प्रतिदिन पाए गए, जबकि गर्मियों में यह बढ़कर 21.1 कण 2.1 प्रतिदिन हो गया।

नमूने में जिंक, एल्युमिनियम जैसे जहरीले धातु तत्व भी 
अध्ययन के दौरान 2024 में दिल्ली के लोधी रोड क्षेत्र से हवा के नमूने लिए गए। इनमें कुल 2,087 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए। इनमें प्रमुख प्रकार थे। 41%  पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी)। यह एक प्रकार का थर्मोप्लास्टिक पॉलिमर है जो पेट्रोलियम से बनाया जाता है। पारदर्शी, हल्का और मजबूत होने के कारण इसका इस्तेमाल पैकेजिंग और बोतलों में सबसे ज्यादा किया जाता है। इसके अलावा पॉलीथीन 27, पॉलिएस्टर 18, पॉलिएस्टाइरीन 9 और पीवीसी 5% पाए गए। नमूनों में केवल प्लास्टिक ही नहीं बल्कि जिंक, सिलिकॉन और एल्युमिनियम जैसे जहरीले धातु तत्व भी पाए गए। ये धातुएं माइक्रोप्लास्टिक के साथ मिलकर हवा को और ज्यादा खतरनाक बना देती हैं और स्वास्थ्य पर बहुआयामी असर डाल सकती हैं।

पैकेजिंग, कपड़ा उद्योग हैं कारण 
दिल्ली में हर दिन लगभग 11,335 टन ठोस कचरा पैदा होता है, जिसमें से 1,145 टन प्लास्टिक और करीब 635 टन सिंगल-यूज प्लास्टिक शामिल है। इसके मुख्य स्रोत घरेलू और औद्योगिक प्लास्टिक कचरा, कपड़े धोने और कपड़ा उद्योग से निकलने वाले रेशे हैं। इसके अलावा पैकेजिंग सामग्री से निकलने वाले और हवा के जरिए दूर-दराज इलाकों से आए कण भी शामिल हैं।

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