सेहत की चिंता: रहना है सेहतमंद तो प्लास्टिक के बर्तनों में न खाएं न ही गर्म करें खाना.., विशेषज्ञ बोले-खुद करनी होगी रक्षा

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प्लास्टिक हमारे हवा, भोजन, पानी और यहां तक कि शरीर तक में पहुंच चुका है, लेकिन वैज्ञानिक अभी भी यह नहीं जानते कि इसका स्वास्थ्य पर वास्तविक प्रभाव कितना खतरनाक हो सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आम लोगों को प्लास्टिक से दूरी बनाने में कितना प्रयास करना चाहिए।

नेशनल जियोग्राफिक से बातचीत में ओशन कन्सर्वेंसी की डायरेक्टर ऑफ ओशन प्लास्टिक्स रिसर्च ब्रिट्टा बैचलर और एमोरी युनिवर्सिटी के माइक्रोप्लास्टिक एवं पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञ डगलस वॉकर बताते हैं कि प्लास्टिक से पूरी तरह बचना फिलहाल नामुमकिन है। इसलिए अपनी सुरक्षा का सबसे भरोसेमंद तरीका यही है कि हम खुद जागरूक होकर प्लास्टिक के उपयोग को कम करें, विशेषकर खाने-पीने और गर्मी के संपर्क वाले प्लास्टिक से बचना चाहिए। इस समय हमारे पास सबसे कारगर रास्ता वही है जो व्यक्तिगत स्तर पर अपनाएं। वैज्ञानिकों के अनुसार हर साल लगभग 11 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक समंदर में पहुंच जाता है और वर्ष 2040 तक यह आंकड़ा तिगुना हो सकता है। हवा से लेकर पहाड़ों तक माइक्रो प्लास्टिक पाया जा चुका है। मानव के मस्तिष्क, फेफड़ों, पाचन तंत्र और गर्भनाल में भी इनके कण मिल चुके हैं।

 

गर्मी और प्लास्टिक का मेल सबसे खतरनाक
ब्रिट्टा बैचलर मानती हैं कि प्लास्टिक कंटेनर और गर्मी का संयोजन माइक्रोप्लास्टिक जोखिम को बहुत बढ़ाता है। इसलिए वे घर पर कभी भी प्लास्टिक के बर्तनों में गरम खाना रखने या गरम करने से बचती हैं। वे बताती हैं कि बाहर रहते हुए कॉफी कप भी प्लास्टिक लाइनिंग वाले होते हैं, इसलिए विकल्प चुनना जरूरी है।उनके अनुसार लॉन्ड्री भी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का एक बड़ा स्रोत है। सिंथेटिक कपड़ों को धोने पर माइक्रोफाइबर निकलकर वेस्टवॉटर में चले जाते हैं, जिनमें से अधिकांश खेतों में उर्वरक के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले स्लज में पहुंच जाते हैं। वे कम तापमान पर कपड़े धोने, हल्के डिटर्जेंट का प्रयोग करने और बाहरी धुलाई फिल्टर या माइक्रोफाइबर कलेक्ट करने वाले बैग बॉल्स का इस्तेमाल करने को स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद मानती हैं।

साठ कंपनियां दुनिया की आधी प्लास्टिक प्रदूषण की जिम्मेदार
एक अध्ययन के अनुसार विश्व के कुल प्लास्टिक प्रदूषण का लगभग आधा हिस्सा केवल 60 कंपनियों से आता है। ब्रिट्टा बैचलर कहती हैं कि इस संकट से निपटने के लिए तीन बड़े परिवर्तन आवश्यक हैं। पहला,सिंगल-यूज प्लास्टिक के उत्पादन में तेजी से कमी लाना, क्योंकि समुद्री तटों पर मिलने वाले कचरे में सबसे अधिक यही वस्तुएं पाई जाती हैं।  दूसरा,पुरानी और बोझिल प्लास्टिक प्रबंधन प्रणाली को सुधारकर रिसाइकलिंग को प्रभावी बनाना। तीसरा,जनता द्वारा कंपनियों और नीति-निर्माताओं पर दबाव डालना, क्योंकि उपभोक्ताओं की आवाज उद्योग पर असर डालती है। डगलस वॉकर पैकेजिंग की एफीशिएन्सी पर जोर देते हैं। वे पूछते हैं कि आखिर क्यों हर वस्तु को अलग-अलग लपेटकर बेचा जाता है और क्यों जरूरी सामानों को इतनी परतों में पैक किया जाता है। उनके अनुसार जिम्मेदारी केवल उपभोक्ताओं की नहीं बल्कि उद्योगों की भी है कि वे प्लास्टिक का उपयोग समझदारी से करें।

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