अमेरिका-ईरान के बीच तकरीबन चार महीने से युद्ध जारी है। इस संघर्ष में बीच में एक दौर संघर्ष विराम का भी आया, जब दोनों ही देश कुछ शर्तों के साथ युद्ध रोकने के लिए तैयार हो गए। इस अंतरिम समझौते में एक शर्त ईरान के परमाणु संवर्धन को आगे न बढ़ाने की थी। हालांकि, न तो शांति का यह दौर ज्यादा दिन नहीं चला और न ही युद्ध रोकने की शर्तों पर ही दोनों देश कायम रह सके।
पहले जानें- क्या है परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान की बदली हुई योजना?
1. ईरान ने बदला परमाणु संवर्धन केंद्र का ठिकाना
ईरान ने अमेरिका-इस्राइल के पिछले हमलों के बाद नतांज के पास पिकैक्स पहाड़ी क्षेत्र में एक नया और अत्यधिक गहरा भूमिगत परमाणु केंद्र बनाना शुरू किया है। यह कदम उसके परमाणु बुनियादी ढांचे को नष्ट होने से बचाने की रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि यह नई सुविधा जमीन के 80 से 100 मीटर (या उससे भी ज्यादा) नीचे मौजूद है।
इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि ईरान के पिछले सेंट्रीफ्यूज कार्यक्रम को अमेरिकी-इस्राइली हमलों में जबरदस्त नुकसान हुआ था। इसके बाद से ही ईरान ने बड़े पैमाने पर कोई असेंबली प्लांट बनाने को लेकर स्थिति साफ नहीं की। हालांकि, यह माना जा रहा है कि वह परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए एक छोटी सेंट्रीफ्यूज असेंबली सुविधा स्थापित कर सकता है।
2. संवर्धन के स्तर की जानकारी देना भी बंद
ईरान की ओर से परमाणु संवर्धन के स्तर को लेकर भी स्थिति में बदलाव देखा गया है। एक पूर्ण परमाणु बम बनाने के लिए ईरान को यूरेनियम को 90% की शुद्धता तक संवर्धित करना होगा। 2025 में हुए हमलों से पहले ईरान ने 60% (हथियारों के स्तर के करीब) तक यूरेनियम संवर्धित कर लिया था, लेकिन हमलों के बाद से उसने संवर्धन फिर से शुरू नहीं किया। हालांकि, उसके बाद से संवर्धन फिर से शुरू होने की कोई जानकारी नहीं है और माना जाता है कि उनका भंडार अभी भी बमबारी वाले स्थलों पर ही है, जिसे वह चुपके से निकालने की कोशिश में है।
नीतिगत स्तर पर भी ईरान के रुख में बदलाव के संकेत मिले हैं। जहां पहले दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने परमाणु हथियारों को गैर-इस्लामी बताते हुए एक फतवा (धार्मिक आदेश) जारी किया था, वहीं हाल के युद्धों से पहले ईरानी अधिकारियों ने परमाणु बम बनाने की धमकियां लगातार तेज कर दी थीं। हालांकि, ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने अभी तक परमाणु बमों के निर्माण को लेकर कोई बयान जारी नहीं किया है और न ही इससे जुड़ी धमकियां दी हैं। इसके चलते ईरान की भावी परमाणु योजनाएं अस्पष्ट बनी हुई हैं।
क्या परमाणु हथियार बनाने की तैयारी कर रहा ईरान?
ईरान ने अपने परमाणु संवर्धन और सेंट्रीफ्यूज निर्माण का ठिकाना मुख्य रूप से अपने परमाणु बुनियादी ढांचे को लगातार हो रहे सैन्य हमलों और तोड़फोड़ से बचाने के लिए बदला है। इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी (आईएसआईएस) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिकैक्स पहाड़ी पर स्थित केंद्र अभी पूरी तरह से चालू नहीं है, लेकिन अगर ईरान अपनी नष्ट हो चुकी सेंट्रीफ्यूज निर्माण क्षमता को दोबारा विकसित करता है, तो वह यहां एक छोटी सेंट्रीफ्यूज असेंबली सुविधा स्थापित कर संभावित रूप से परमाणु हथियार कार्यक्रम को बढ़ाया जा सकता है।
यूरेनियम संवर्धन की संभावना: रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सौदे का सबसे विवादास्पद प्रावधान यह है कि यह भविष्य में सऊदी अरब की धरती पर यूरेनियम संवर्धन की इजाजत दे सकता है। समझौते के ड्राफ्ट के मुताबिक, अमेरिका और सऊदी अरब एक संयुक्त अध्ययन करेंगे। अगर इसे आर्थिक रूप से ठीक पाया जाता है, तो अमेरिकी कंपनियां एक गुप्त ब्लैक बॉक्स व्यवस्था के तहत वहां संवर्धन सुविधा का निर्माण करेंगी। इससे संवेदनशील तकनीक सऊदी अरब के सीधे हाथ में जाने से बचेगी।
निगरानी और शर्तों में ढील: यह सौदा अमेरिकी कूटनीति के पारंपरिक गोल्ड स्टैंडर्ड यानी उच्च मानक और निगरानी वाले समझौतों से अलग है। इसमें आमतौर पर भागीदार देशों (जैसे यूएई) को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन न करने की शर्त माननी होती है। हालांकि, सऊदी अरब को इससे छूट दी गई है। इसके अलावा, सऊदी अरब ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के कड़े निरीक्षण वाले अतिरिक्त प्रोटोकॉल को भी अस्वीकार कर दिया है। इसकी जगह अमेरिका-सऊदी द्विपक्षीय निगरानी व्यवस्था लागू होगी। यानी सऊदी के परमाणु संवर्धन या परमाणु हथियार बनाने की जानकारी का खुलासा भी नहीं हो सकेगा।
क्यों अमेरिका-सऊदी अरब के समझौते पर जताई जा रही चिंता?
1. युद्ध के समय की तैयारी
यह ऐतिहासिक समझौता ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका सीधे तौर पर ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को नष्ट करने के लिए सैन्य हमलों में उलझा हुआ है। एक तरफ अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ वह सऊदी अरब को परमाणु तकनीक दे रहा है, जिसे कई विशेषज्ञ विरोधाभासी मानते हैं।
2. हथियारों की नई होड़ का खतरा
विशेषज्ञों और अमेरिकी सांसदों को इस बात की गहरी चिंता है कि सऊदी अरब को घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धित करने की छूट देने से पश्चिम एशिया में ईरान, इस्राइल और खाड़ी देशों के बीच एक नई परमाणु प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।
3. पाकिस्तान का ‘परमाणु कवच’
कूटनीतिक मोर्चे पर सऊदी अरब ने परमाणु-हथियार संपन्न पाकिस्तान के साथ एक पारस्परिक रक्षा समझौता पहले भी किया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने यहां तक कहा है कि जरूरत पड़ने पर उनका परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब के लिए उपलब्ध कराया जाएगा, जिसे क्षेत्र में एक कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
4. चीन और रूस को रोकना
ईरान के अलावा अमेरिका की एक बड़ी रणनीतिक मंशा यह भी है कि इस समझौते के जरिए वह सऊदी अरब के परमाणु विकास को अपनी निगरानी और नियंत्रण में रखे। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ऐसा करने से रूस या चीन को सऊदी अरब में अपना भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का मौका नहीं मिलेगा।
अमेरिका का दावा है कि यह समझौता पूरी तरह से शांतिपूर्ण और कड़े अमेरिकी नियंत्रण में है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन की संभावित इजाजत और ताजा युद्ध के हालात स्पष्ट रूप से इस ओर इशारा करते हैं कि यह समझौता सऊदी अरब को ईरान के बढ़ते परमाणु प्रभाव के खिलाफ एक मजबूत रणनीतिक विकल्प प्रदान कर रहा है।







