अचानक क्यों बदला मौसम?: उत्तर भारत में फिर कमजोर पड़ा मानसून, पूर्वोत्तर में बाढ़ का कहर, क्यों कम हो रही मानसूनी बारिश?

त्तर भारत में कुछ दिनों की सक्रियता के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून एक बार फिर कमजोर पड़ गया है। इसका सबसे अधिक असर हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली-एनसीआर में महसूस किया जा रहा है, जहां उमस भरी गर्मी फिर लौट आई है। वहीं, पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में मानसून पूरी तरह सक्रिय है और वहां मूसलाधार बारिश हो रही है। अरुणाचल प्रदेश में बारिश के चलते आई बाढ़ से लगभग एक लाख लोग प्रभावित हुए हैं। मौसम विभाग ने पूर्वोत्तर के राज्यों समेत बिहार और पश्चिम बंगाल के गंगा किनारे वाले क्षेत्रों में इस हफ्ते भारी बारिश जारी रहने को लेकर ऑरेंज अलर्ट जारी किया है, जबकि उत्तराखंड समेत कई राज्यों में भारी वर्षा और भूस्खलन की चेतावनी दी है।

 

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, मानसूनी ट्रफ इस समय उत्तर की ओर खिसकर हिमालय की तलहटी में चली गई है। मानसून ट्रफ यानी कम दबाव वाले क्षेत्रों की लंबी और विस्तृत पट्टी भारत में मानसून हवाओं को आकर्षित करती है और बारिश का मुख्य कारण बनती है। इसके उत्तर में खिसकने से उत्तर भारत में मानसून की स्थिति कमजोर पड़ गई है, जिसे आमतौर पर मानसून ब्रेक के रूप में वर्णित किया जाता है। इस मौसमी बदलाव के कारण ही पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में झमाझम बारिश हो रही है। आईएमडी के मुताबिक, उत्तर भारत में अगले सात दिन अधिकतम तापमान में कोई बदलाव होने की उम्मीद नहीं है और उमस भरी गर्मी बनी रहेगी। सोमवार को दिल्ली में अधिकतम तापमान 38 डिग्री से अधिक दर्ज किया गया।

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अरुणाचल प्रदेश में जनजीवन बेपटरी
अरुणाचल प्रदेश में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने भारी तबाही मचाई है। सोमवार को राज्य के कई हिस्सों में बाढ़ और भीषण भूस्खलन के कारण सड़कें टूट गई हैं और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा है। राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, बारिश, बाढ़ और भूस्खलन के इस मौजूदा सिलसिले ने अब तक राज्य भर में 7 मासूम लोगों की जान ले ली है, जबकि 29 अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। राज्य के 26 जिलों के 425 गांव प्रभावित हुए हैं और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है।

 

कमजोर मानसून से खरीफ फसलों की बुवाई 16% घटी
नई दिल्ली। कमजोर मानसून के कारण धान जैसी खरीफ फसलों की बुवाई का रकबा मौजूदा सत्र में 10 जुलाई तक 16 फीसदी घटकर 531.25 लाख हेक्टेयर रह गया। पिछले साल की समान अवधि में यह आंकड़ा 632.69 लाख हेक्टेयर था। कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 10 जुलाई तक धान की बुवाई का रकबा 8.63 फीसदी घटकर 114.69 लाख हेक्टेयर रह गया। एक साल पहले की समान अवधि में 125.53 लाख हेक्टेयर में धान की बुवाई हुई थी।

दलहनों का रकबा भी 73.85 लाख हेक्टेयर से 23.31 फीसदी कम होकर 56.63 लाख हेक्टेयर रह गया। इसमें अरहर की बुवाई 19.54 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो एक साल पहले के 28.03 लाख हेक्टेयर से कम है। उड़द की बुवाई का रकबा 9.34 लाख हेक्टेयर और मूंग का 21.52 लाख हेक्टेयर रह गया।

इसी प्रकार, मोटे अनाज के तहत रकबा पहले के 127.30 लाख हेक्टेयर से 22.47 फीसदी घटकर 98.69 लाख हेक्टेयर रह गया। नकदी फसलों में, कपास की बुवाई में भी गिरावट आई है और इसका रकबा 15.33 फीसदी कम होकर 79.54 लाख हेक्टेयर रह गया।

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तिलहन की बुवाई भी घटी, गन्ने का रकबा बढ़ा
तिलहन की बुवाई का रकबा पहले के 149.18 लाख हेक्टेयर के मुकाबले 21 फीसदी घटकर 117.83 लाख हेक्टेयर रह गया। तिलहन में, सोयाबीन की बुवाई का रकबा पहले के 107.72 लाख हेक्टेयर से 16 फीसदी कम होकर 90.51 लाख हेक्टेयर रह गया। गन्ने की खेती का रकबा 56.72 लाख हेक्टेयर के मुकाबले थोड़ा बढ़कर 57.58 लाख हेक्टेयर पहुंच गया, जबकि जूट या मेस्टा का रकबा पहले के 6.16 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.28 लाख हेक्टेयर हो गया।

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