संकट: तेजी से बढ़ता तापमान 2030 तक तोड़ देगा 1.5 डिग्री की सीमा, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची धरती की गर्मी

जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी पहले से कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रही है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन मौजूदा गति से जारी रहा तो 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस की महत्वपूर्ण सीमा पार कर सकता है। इसका गंभीर असर समुद्रों, कृषि, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता, अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य तक दिखाई देगा।

 

अर्थ सिस्टम साइंस डेटा में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, 2025 में पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक युग से पहले के स्तर की तुलना में लगभग 1.39 डिग्री अधिक दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि इस अतिरिक्त गर्मी का पूरा हिस्सा मानवजनित गतिविधियों से पैदा हुआ है। जीवाश्म ईंधन का व्यापक उपयोग, उद्योगों से निकलने वाला कार्बन प्रदूषण और बड़े पैमाने पर वनों की कटाई इसके प्रमुख कारण हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में तापमान वृद्धि की रफ्तार पहले के दशकों की तुलना में और तेज हुई है।

यही वजह है कि अब 1.5 डिग्री की सीमा पार होने की आशंका पहले से अधिक वास्तविक दिखाई दे रही है। 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते में दुनिया के देशों ने यह लक्ष्य तय किया था कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखा जाए और संभव हो तो इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस सीमा के भीतर रहने से जलवायु परिवर्तन के सबसे विनाशकारी प्रभावों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
समुद्र का तेजी से बढ़ता स्तर तटीय क्षेत्रों के लिए बन रहा खतरा
अध्ययन के अनुसार, 1901 के बाद से वैश्विक समुद्र स्तर लगभग 23 सेंटीमीटर बढ़ चुका है। यह वृद्धि तटीय क्षेत्रों के लिए बड़ा खतरा है। समुद्रों का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है। गर्म समुद्री जल के कारण समुद्री लू की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इससे प्रवाल भित्तियों, मछलियों और अन्य समुद्री जीवों पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। अध्ययन के अनुसार 1991 की तुलना में समुद्री लू वाले दिनों की संख्या तीन गुना से अधिक हो चुकी है।

दुनिया के सामने बढ़ती चुनौती
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, समुद्र स्तर में वृद्धि, चरम मौसम घटनाएं और पारिस्थितिक तंत्र पर बढ़ता दबाव दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार अभी भी स्थिति को पूरी तरह अनियंत्रित होने से रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेज और व्यापक कटौती करनी होगी। साथ ही जलवायु निगरानी नेटवर्क को मजबूत बनाना और स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ना होगा।

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