SC- फर्जी मुकदमों पर सुप्रीम सख्ती, पति पर लगे दुष्कर्म समेत 10 केस किए खारिज

Spread the love

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (29 मई) को वैवाहिक विवादों में झूठे और दुर्भावनापूर्ण आपराधिक मामलों के बढ़ते चलन पर कड़ी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि अदालतों और वकीलों दोनों की जिम्मेदारी है कि वे व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए आपराधिक कानून के दुरुपयोग को हतोत्साहित करें।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज 10 से अधिक आपराधिक मामलों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इन मामलों में पॉक्सो कानून और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत दुष्कर्म के आरोप भी शामिल थे।

अदालत ने टिप्पणी की कि, ”वैवाहिक विवादों के क्षेत्र में तुच्छ और झूठे आरोपों पर आधारित दुर्भावनापूर्ण मुकदमों को न्यायालयों और बार के सदस्यों द्वारा हतोत्साहित किया जाना चाहिए। अधिवक्ताओं को अपने मुवक्किलों को जीवनसाथी के खिलाफ तुच्छ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय ऐसा न करने की सलाह देनी चाहिए।”

वकीलों की सामाजिक जिम्मेदारी का किया जिक्र
पीठ ने अचिन गुप्ता बनाम हरियाणा सरकार के एक मामले में की गई टिप्पणी का भी जिक्र किया। उस फैसले में कहा गया था कि वकीलों पर सामाजिक जिम्मेदारी है कि वे पारिवारिक जीवन के सामाजिक ताने-बाने को टूटने से बचाएं।

अदालत ने कहा था कि छोटे-छोटे विवादों को बढ़ा-चढ़ाकर आपराधिक शिकायतों का रूप नहीं दिया जाना चाहिए। अधिकतर शिकायतें वकीलों की सलाह या सहमति से दर्ज होती हैं। इसलिए बार के सदस्य हर 498ए मामले को मानवीय समस्या मानकर पक्षों के बीच सौहार्दपूर्ण समाधान का प्रयास करें।

और पढ़े  प्रधानमंत्री मोदी ने किया नशे के खिलाफ देशव्यापी अभियान का आगाज: बोले- युवा तन-मन से हों स्वस्थ, तभी विकसित होगा भारत

क्या था मामला?
यह मामला पत्नी और पति के परिवार के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा था। दोनों की शादी 2008 में हुई थी और उनके दो बच्चे हैं। वर्ष 2011 में पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी, जबकि बच्चे पति के परिवार के साथ रहे। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच 10 से ज्यादा आपराधिक और दीवानी मामले दर्ज हुए। इनमें आईपीसी की धारा 498ए, घरेलू हिंसा कानून, हत्या के प्रयास के आरोप और तलाक संबंधी मामले शामिल थे।

2024 में दायर विवादित शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पति ने अपनी नाबालिग बेटी से दुष्कर्म किया और उसके चाचा ने भी यौन उत्पीड़न किया। साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों पर बच्ची को प्रताड़ित करने और धमकाने के आरोप लगाए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया क्या फैसला?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि आरोप अस्पष्ट हैं, मेडिकल साक्ष्यों से समर्थित नहीं हैं और प्रतिशोध की भावना से दर्ज किए गए मुकदमों की श्रृंखला का हिस्सा प्रतीत होते हैं। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि शिकायतकर्ता और पीड़िता के बयान लगभग शब्दशः एक जैसे थे।

अदालतों को रहना चाहिए सतर्क : सुप्रीम कोर्ट
पीठ ने कहा, ”विशेषकर दुष्कर्म जैसे आरोपों वाले मामलों में अदालतों को बेहद सतर्क रहना चाहिए। पहले से चल रहे वैवाहिक विवादों में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने, मनगढ़ंत आरोप लगाने और दुर्भावनापूर्ण मुकदमेबाजी की आशंका कहीं अधिक होती है।”

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल इस मामले के तथ्यों तक सीमित हैं और इन्हें यौन उत्पीड़न या वैवाहिक क्रूरता की वास्तविक शिकायतों को कमजोर करने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

और पढ़े  यूक्रेन पर रूस का भीषण हमला: कीव पर बरसाईं मिसाइलें और ड्रोन, नौ की मौत

Spread the love
  • Related Posts

    ₹2 हजार से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर क्या लग सकता है चार्ज, नए कानून से क्या बदल जाएगा?

    Spread the love

    Spread the loveक्या 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर चार्ज लग सकता है? संसद से एक संशोधन विधेयक पारित होने के बाद यही चर्चा सबसे ज्यादा हो रही…


    Spread the love

    सुप्रीमकोर्ट: 4 साल की दुष्कर्म पीड़िता का इलाज करने से किया था इनकार, अब अस्पताल भरेंगे 12 लाख जुर्माना

    Spread the love

    Spread the loveसुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों को चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की मौत के मामले में उसके परिवार को क्रमशः 10 लाख रुपये और…


    Spread the love