दक्षिणी दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट में बुधवार को हरीश राणा का पूरे सम्मान और श्रद्धा के साथ अंतिम संस्कार किया गया। परिवार के सदस्यों के साथ महिलाओं के नेतृत्व वाले आध्यात्मिक आंदोलन ब्रह्म कुमारी के प्रतिनिधि भी अंतिम संस्कार में शामिल हुए। इस दौरान माहौल बेहद भावुक था और हर किसी की आंखें नम नजर आईं। गाजियाबाद की राज एम्पायर सोसाइटी के निवासी भी अपना समर्थन देने के लिए वहां पहुंचे। इस समूह में विभिन्न एनजीओ, एम्स के कर्मचारी, रिश्तेदार और दोस्त भी शामिल थे।

अंतिम संस्कार से पहले शोक के साथ एक गहरी खामोश राहत भी महसूस की जा रही थी। 13 वर्षों तक कोमा में जीवन और मृत्यु के बीच झूलते रहे हरीश राणा को आखिरकार इच्छामृत्यु के बाद उस पीड़ा से मुक्ति मिल गई, जिसने उनके साथ पूरे परिवार को भीतर तक तोड़ दिया था।

पार्थिव शरीर जैसे ही एम्बुलेंस से उतारा गया, हर आंख नम थी। इन आंसुओं में बिछड़ने का दर्द तो था ही लेकिन एक लंबे कष्ट के अंत की थकी हुई राहत भी नजर आई। गुलाब की पंखुड़ियों से सजी चिता के सामने खड़े लोग मानो उस संघर्ष के गवाह थे, जो हरीश ने वर्षों तक बिना कुछ कहे सहा।
लवली ने कहा कि शरीर तो इस नश्वर संसार को छोड़कर जा रहा है, लेकिन आत्मा अमर है। उसने एक नई यात्रा शुरू कर दी है। सिस्टर लवली ने बताया कि आने वाले दिनों में ब्रह्मा कुमारीज की ओर से एक भोग (प्रसाद) और प्रार्थना सभा आयोजित की जाएगी, जिसमें हरीश को पसंद आने वाले व्यंजन तैयार किए जाएंगे।
अंतिम संस्कार में परिवार ने कहा कि रोइए मत, वह अब एक अच्छी जगह पर है। उनके माता-पिता अशोक राणा और निर्मला देवी ने सभी से शोक व्यक्त करते हुए शांति बनाए रखने का आग्रह किया। साथ ही, पड़ोसियों और शुभचिंतकों ने परिवार के उस अटूट समर्पण की सराहना की, जिसके साथ उन्होंने पिछले कई वर्षों के दौरान भावनात्मक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए भी हरीश की देखभाल की।








