इस दौरान मेडिकल टीम लगातार मरीज की स्थिति की निगरानी करेगी और समय-समय पर रिपोर्ट तैयार कर अदालत को सौंपेगी। अंतिम निर्णय इन्हीं रिपोर्ट्स के आधार पर लिया जाएगा।
‘पैलिएटिव केयर में मौत को तेज नहीं किया जाता’
अस्पताल के पूर्व पैलिएटिव विशेषज्ञ डॉ. सुशमा भटनागर के अनुसार, पैलिएटिव केयर में मौत को तेज नहीं किया जाता, बल्कि दर्द-तकलीफ कम कर प्राकृतिक मौत की अनुमति दी जाती है। फोकस मरीज की आराम और गरिमा पर है।
भारत के पहले निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लागू करने के लिए डॉ. सीमा मिश्रा की अध्यक्षता में एक विशेष मेडिकल टीम का गठन किया गया है। डॉ. सीमा मिश्रा एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन विभाग की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं। इस टीम में न्यूरो सर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया और पैलिएटिव मेडिसिन और मनोरोग विभागों के डॉक्टर शामिल हैं।
15 दिन से एक महीना तक लग सकता है
एम्स के पूर्व निदेशक और सीताराम भारतीय इंस्टीट्यूट के कंसलटेंट डॉ. एमसी मिश्रा ने बताया कि ऐसे मामलों में हर कदम बेहद सावधानी से उठाया जाता है। डॉक्टर मरीज की स्थिति का आकलन कर कोर्ट को रिपोर्ट देते हैं और उसी के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होती है।
हरीश राणा के मामले में यह कहना मुश्किल है कि उनकी सांसें कब तक चलेंगी। अगर निष्क्रिय इच्छामृत्यु की प्रक्रिया अपनाई जाती है, तो न्यूट्रिशन बंद करने के बाद भी 15 दिन, एक महीना या उससे ज्यादा समय लग सकता है।
हरीश के अंगदान पर भी टीम कर रही जांच
सूत्रों के अनुसार, हरीश के अंगों को दान करने के परिवार के संकल्प के बाद, एम्स की एक मेडिकल टीम अपने सहयोगियों की मदद से उनके शरीर की पूरी जांच कर रही है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि कौन से अंग अभी काम कर रहे हैं और दान के लिए सही हैं।
इसके बाद पूरी जानकारी और सहमति के साथ अंग निकालने की जरूरी प्रक्रिया शुरू की जाएगी। हरीश के माता-पिता ने बड़ा दिल दिखाते हुए अंगदान का फैसला किया है। एम्स के नियमों के अनुसार, हरीश की किडनी, दिल, पैंक्रियास और आंतों जैसे अंगों को दान के लिए विचाराधीन रखा गया है, बशर्ते वे काम कर रहे हों। उनकी कॉर्निया और हार्ट वाल्व की भी जांच की जा रही है। शुरुआती जांच के बाद, डॉक्टर तय करेंगे कि कौन से अंग ट्रांसप्लांट के लिए सुरक्षित रूप से निकाले जा सकते हैं।