गुटखा-पान मसाला कंपनियों पर बैन प्लास्टिक पाउच के इस्तेमाल का आरोप, DPCC की रिपोर्ट खारिज करने की मांग

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राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों को लेकर एक बड़ा मामला चल रहा है। ऐसे में सिटीजन फाउंडेशन नाम की संस्था ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की स्थिति रिपोर्ट को अधूरा और भ्रामक बताते हुए जवाब दाखिल किया है।

 

संस्था का दावा है कि गुटखा, पान मसाला और तंबाकू बनाने वाली कंपनियां अभी भी प्रतिबंधित मल्टीलेयर प्लास्टिक पैकेजिंग का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन डीपीसीसी ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। संस्था ने कहा कि यह प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियम 2016 के नियम 4(एफ) और 4(आई) के साफ तौर पर खिलाफ है।

 

संस्था के अध्यक्ष सद्दाम मुजीब ने 16 दिसंबर 2025 को दाखिल जवाबी अर्जी में कहा कि डीपीसीसी ने 25 सितंबर 2025 की अपनी रिपोर्ट में सच्चाई छिपाई है। रिपोर्ट अधूरी, गुमराह करने वाली और अस्पष्ट है। डीपीसीसी ने सिर्फ चुनिंदा और पुरानी जांचों 2022 की सीआईपीईटी रिपोर्ट का हवाला दिया, लेकिन बाजार में उपलब्ध प्लास्टिक पाउच, गोदाम, सप्लाई चेन या असली उत्पादन स्थलों की कोई सच्ची जांच नहीं की।

सिटीजन फाउंडेशन ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और अन्य के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। इसमें कहा कि 2016 के प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स के तहत गुटखा जैसी चीजों की पैकिंग में पतली प्लास्टिक या लेमिनेटेड पाउच का इस्तेमाल बंद होना चाहिए। लेकिन, कंपनियां नियम तोड़ रही हैं, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। एनजीटी ने मई 2025 में आदेश दिया था कि डीपीसीसी अपनी रिपोर्ट दे। डीपीसीसी ने सितंबर 2025 में रिपोर्ट दी, लेकिन फाउंडेशन ने इसे खारिज करने की मांग की है।

फाउंडेशन के आरोप
संस्था के अध्यक्ष सद्दाम मुजीब की ओर से दाखिल जवाब में कहा कि डीपीसीसी की रिपोर्ट पुराने 2022 के लैब टेस्ट पर आधारित है और हाल की स्थिति नहीं दिखाती। रिपोर्ट में यह नहीं बताया कि सीपीसीबी के 2021 के आदेशों का पालन हुआ या नहीं। उन आदेशों में कंपनियों को बंद करने, पर्यावरण मुआवजा वसूलने और वैकल्पिक पैकिंग इस्तेमाल करने को कहा गया था। फाउंडेशन ने कहा कि डीपीसीसी ने न तो कंपनियां बंद कीं, न मुआवजा वसूला और न ही बाजार में
जांच की।

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वहीं, फाउंडेशन ने एनजीटी से मांग की है कि डीपीसीसी की रिपोर्ट खारिज की जाए। साथ ही, सीपीसीबी और डीपीसीसी को आदेश दिया जाए कि वे फैक्टरियों, गोदामों और बाजारों में जांच करें, गैरकानूनी पैकिंग जब्त करें और मुआवजा वसूलें। साथ ही, सभी जिलों की पूरी जानकारी दें।

आरटीआई से खुलासा
फाउंडेशन ने जून 2025 में आरटीआई दाखिल की थी, जिसमें पूछा कि 2021 से अब तक कितनी कंपनियों को लाइसेंस दिए, नोटिस भेजे, बंद किए या मुआवजा लिया। डीपीसीसी के जुलाई 2025 के जवाब में सिर्फ पश्चिम जिला में 4 कंपनियों को लाइसेंस देने की बात कही गई, बाकी जिलों की जानकारी नहीं दी।

इससे साबित होता है कि डीपीसीसी पारदर्शी नहीं है और कार्रवाई कमजोर है। संस्था का आरोप है कि कंपनियां लोकेशन बदलकर रेजिडेंशियल ऑफिस दिखाकर बच रही हैं। जांचें सिर्फ कोर्ट केस दाखिल होने के बाद की गईं, जो स्वार्थपूर्ण हैं। बाजार सैंपलिंग, रैंडम चेकिंग या वेयरहाउस जांच बिल्कुल नहीं हुई।


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