चिंताजनक: 18 राज्यों के 151 जिलों के भूजल तक पहुंचा यूरेनियम, पंजाब सबसे अधिक प्रभावित राज्य

देश के कई राज्यों के भूजल में यूरेनियम की खतरनाक मौजूदगी सामने आई है। कई क्षेत्रों में पीने के पानी में भी यूरेनियम की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय सुरक्षित मानकों से कई गुना अधिक है। कुल 14,377 नमूनों की जांच में यूरेनियम की सांद्रता 0 से 2,876 माइक्रोग्राम प्रति लीटर तक दर्ज की गई, जो डब्ल्यूएचओ की 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर सीमा से 96 गुना तक अधिक है।

18 राज्यों के 151 जिले आंशिक रूप से इस समस्या से प्रभावित पाए गए हैं, जबकि पंजाब सबसे अधिक प्रभावित राज्य के रूप में सामने आया है। यह जानकारी सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की पहली राष्ट्रीय स्तर की निगरानी में सामने आई है। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के अनुसार देश में पहली बार वर्ष 2019-20 में भूजल में यूरेनियम की राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी की गई। इसके तहत 14,377 भूजल नमूनों की जांच की गई, जिन्हें नियमित रूप से मॉनिटर किया जा रहा है।

रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि कई क्षेत्रों में भूजल में यूरेनियम की सांद्रता सामान्य स्तर से काफी अधिक है, जिससे पेयजल सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी में यूरेनियम की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है। इसे पार्ट्स प्रति बिलियन यानी पीपीबी भी कहा जाता है। इसके विपरीत भारतीय मानक ब्यूरो ने अभी तक यूरेनियम के लिए कोई अलग मानक तय नहीं किया है।

एईआरबी की 60 पीपीबी सीमा पर भी पंजाब शीर्ष पर
परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की 60 माइक्रोग्राम प्रति लीटर सीमा के आधार पर भी पंजाब सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा, जहां 6 फीसदी कुओं में यूरेनियम की मात्रा 60 पीपीबी से अधिक पाई गई। दिल्ली में यह आंकड़ा 5 और हरियाणा में 4.4 फीसदी दर्ज किया गया।

तेलंगाना में 2.6, आंध्र प्रदेश में 2, राजस्थान में 1.2 , छत्तीसगढ़ में 1.1, तमिलनाडु में 0.9, कर्नाटक में 0.7 , मध्य प्रदेश में 0.6 उत्तर प्रदेश में 0.4 तथा झारखंड में 0.25 फीसदी कुओं में यूरेनियम की सांद्रता एईआरबी द्वारा तय मानकों से अधिक मिली।

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स्वास्थ्य पर बढ़ी चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक यूरेनियम युक्त पानी के सेवन से सबसे अधिक असर किडनी पर पड़ता है, क्योंकि यूरेनियम एक रासायनिक रूप से विषैला तत्व भी है। इससे गुर्दों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, हड्डियों पर असर पड़ सकता है और लंबे समय में कैंसर जैसी आशंकाएं भी बढ़ सकती हैं, हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार सामान्यतः इसका रासायनिक विषाक्त प्रभाव विकिरण प्रभाव से अधिक गंभीर माना जाता है।

बच्चों, गर्भवती महिलाओं और भूजल पर निर्भर ग्रामीण आबादी के लिए यह खतरा और अधिक संवेदनशील माना जाता है। खासतौर पर ग्रामीण और भूजल पर निर्भर आबादी के लिए यह स्थिति अधिक चिंता का विषय है।

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