क्या 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर चार्ज लग सकता है? संसद से एक संशोधन विधेयक पारित होने के बाद यही चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। विपक्ष का दावा है कि सरकार मुफ्त यूपीआई की कानूनी गारंटी खत्म कर रही है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि अभी यूपीआई पर कोई शुल्क नहीं लगाया गया है। दरअसल, कानून में ऐसा बदलाव किया गया है, जिससे भविष्य में सरकार जरूरत पड़ने पर डिजिटल भुगतान माध्यमों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लागू करने का फैसला ले सकती है।
क्या सभी यूपीआई ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लगाया जा सकता है?
फिलहाल इसका जवाब है नहीं। सरकार ने अभी तक यह तय नहीं किया है कि एमडीआर लागू होगा या नहीं और अगर होगा तो किन लेनदेन पर होगा। लेकिन उद्योग और सरकारी सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है। पहला विकल्प यह है कि एक निश्चित राशि से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर ही एमडीआर लगाया जाए। दूसरा विकल्प यह है कि छोटे व्यापारियों को इससे बाहर रखा जाए और केवल बड़े कारोबारियों पर मर्चेंट शुल्क लागू किया जाए।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने क्या कहा?
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि अभी किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। उनके मुताबिक सरकार फिलहाल केवल कानून में संशोधन कर रही है। आगे क्या व्यवस्था होगी, यह बाद में तय होगा। उन्होंने कहा कि डिजिटल भुगतान जैसी सार्वजनिक व्यवस्था को लगातार मजबूत बनाने के लिए निवेश जरूरी है और इसकी लागत किसी न किसी को उठानी ही होगी। उन्होंने दो संभावित मॉडल बताए;
- पहला, सरकार टैक्स के जरिए इस खर्च को वहन करे।
- दूसरा, ‘यूजर पे’ मॉडल अपनाया जाए, जिसमें एमडीआर के जरिए लागत पूरी की जाए।
मल्होत्रा ने कहा कि अगर एमडीआर लागू होता है तो सामान्यतः इसका भुगतान व्यापारी करते हैं। लेकिन अगर एमडीआर नहीं भी लगाया जाता, तब भी डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर होने वाला खर्च आखिरकार टैक्स के जरिए आम जनता ही उठाती है। उनके अनुसार सबसे जरूरी बात यह है कि यूपीआई जैसी सार्वजनिक डिजिटल व्यवस्था में निवेश लगातार जारी रहे।
क्या 2000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर लगाया जाएगा शुल्क?
रॉयटर्स न्यूज एजेंसी मुताबिक, जिस प्रस्ताव पर चर्चा हुई है, उसके तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर 0.3% से 0.5% तक एमडीआर लगाया जा सकता है। यह भी केवल उन व्यापारियों पर लागू हो सकता है, जिनका सालाना कारोबार 1.5 करोड़ रुपये से अधिक है। यानी छोटे व्यापारियों और आम ग्राहकों को इससे बाहर रखा जा सकता है। हालांकि सरकार ने अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है।
जैफरीज की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान कुल मर्चेंट ट्रांजैक्शन की संख्या का केवल लगभग 4% हैं, लेकिन कुल मूल्य का करीब 67% इन्हीं लेनदेन का होता है। अगर ऐसा मॉडल लागू होता है तो डिजिटल भुगतान उद्योग के लिए 5,000 करोड़ से 10,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त राजस्व तैयार हो सकता है।
आम लोगों पर क्या असर होगा?
फिलहाल आम लोगों के लिए कोई बदलाव नहीं है। यूपीआई पहले की तरह मुफ्त है और ग्राहक को कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ रहा है। सरकार की ओर से भी कहा गया है कि अभी ऐसा कोई फैसला नहीं लिया गया है जिससे ग्राहकों पर सीधा असर पड़े। अगर भविष्य में सरकार एमडीआर लागू करने का फैसला करती है, तब भी यह अलग अधिसूचना के जरिए होगा। उस समय यह तय किया जाएगा कि शुल्क किन लेनदेन पर लगेगा, किन व्यापारियों पर लागू होगा और क्या छोटे कारोबारियों या ग्राहकों को इससे बाहर रखा जाएगा। फिलहाल इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।







