उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि बहन अपने भाइयों से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। न्यायालय ने नैनीताल की प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश नैनीताल द्वारा दिए गए उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दो भाइयों को अपनी बहन को प्रतिमाह तीन हजार रुपये देने तथा उसे पैतृक मकान में रहने देने का निर्देश दिया गया था।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता अमीना तबस्सुम ने आरोप लगाया था कि तलाकशुदा होने के बाद 17 वर्षों से पैतृक घर में रह रही थीं, लेकिन भाइयों व अन्य परिजनों ने उन्हें जबरन निकाल दिया और बैंक खाते से तीन लाख रुपये भी निकाल लिए। इस पर प्रोटेक्शन ऑफिसर की रिपोर्ट के आधार पर सीजेएम नैनीताल ने उनकी अर्जी खारिज कर दी थी। बाद में उन्होंने अपील दायर की, जिस पर 16 जनवरी 2020 को प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश ने भाइयों को प्रतिमाह तीन हजार रुपये भरण-पोषण देने और ‘नूरानी हाउस, पॉपुलर कम्पाउंड, मल्लीताल’ स्थित मकान में रहने देने का आदेश दिया था। भाइयों ने इस आदेश को चुनौती दी। अदालत ने उनके पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम केवल प्रक्रिया संबंधी प्रावधान है और वास्तविक अधिकार अन्य विधानों से मिलते हैं। चूंकि बहन ने अपने अधिकार का कोई कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया, इसलिए अपीलीय न्यायालय का आदेश मान्य नहीं है। उच्च न्यायालय ने साफ किया कि अमीना तबस्सुम यदि चाहें तो संपत्ति में अपने हिस्से का दावा संबंधित न्यायालय में कर सकती हैं।







