फरसा वाले बाबा- हाथ में 15 किलो का हथियार, रात में निकलते थे गोतस्करों को पकड़ने, कई बार हुए जानलेवा हमले

हाथ में 15 किलो का फरसा, रात में सड़कों पर गश्त और गो तस्करी के खिलाफ सख्त तेवर, यही पहचान थी चंद्रशेखर बाबा की, जिन्हें पूरा ब्रज क्षेत्र फरसे वाले बाबा के नाम से जानता था। अब उनके निधन के बाद यही छवि लोगों की यादों में जिंदा है।

Pharsa wale baba lived for cow protection gau seva became his identity

मूल रूप से फिरोजाबाद के नगला भूपाल (सिरसागंज) के रहने वाले चंद्रशेखर बाबा ने 19 साल की उम्र में ही सांसारिक जीवन त्याग दिया था। अयोध्या में कार सेवा में भाग लिया और इसके बाद संन्यास लेकर विवादित विवाद के समय भाग लिया किसके बाद उन्होंने संन्यास लिया और फिर जीवन गोरक्षा को समर्पित कर दिया। उनके पैतृक गांव में उनके बड़े भाई और उनका पूरा परिवार है। बाबा के माता-पिता का उनके बचपन में ही देहांत हो गया था।

 

बाबा के बड़े भाई केशव बताते हैं कि बाबा अपने पैतृक गांव में केवल धार्मिक कार्यों में ही जाते थे, लगुन-विवाह जैसे कार्यक्रमों में वे नहीं जाते थे। बरसाना, नंदगांव कोसीकलां और आसपास के इलाकों में बाबा की अलग ही पहचान थी। वह अपने साथ हमेशा फरसा रखते थे, जो उनके लिए सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि गोरक्षा का प्रतीक बन गया था।

Pharsa wale baba lived for cow protection gau seva became his identity

बाबा ने गोरक्षकों की एक टीम बना रखी थी, जो रात-दिन सक्रिय रहती थी। गो तस्करी की सूचना मिलते ही बाबा खुद मौके पर पहुंचते थे। समर्थकों के अनुसार, उन्होंने कई बार तस्करी के प्रयासों को नाकाम किया और सैकड़ों गोवंश का जीवन बचाया। उनकी दिनचर्या भी असाधारण थी। हर रात को वह सड़कों पर निकलकर निराश्रित गायों की हालत देखते थे। उन्हें खाने-पीने की चिंता नहीं थी, एक आलू में पूरा दिन काट देते थे। उनकी गोशाला में करीब 400 बचाई हुई गायों की देखभाल होती थी, जो उनके जीवन का सबसे बड़ा केंद्र थी।

और पढ़े  रुदौली- विधायक रामचंद्र यादव की बड़ी सौगात, लगभग साठ लाख से बने पांच आंगनबाड़ी केंद्रों का लोकार्पण

कई बार हुए जानलेवा हमले
बाबा पर कई बार हमले भी हुए, लेकिन वह पीछे नहीं हटे। वर्ष 2012 और 2015 में हुए जानलेवा हमलों में वह बाल-बाल बच गए, लेकिन गोरक्षा के अपने मिशन से कभी डिगे नहीं। अब उनके निधन के बाद समर्थकों में गहरा शोक है। लोग उन्हें केवल एक बाबा नहीं, बल्कि गो सेवा के लिए समर्पित योद्धा के रूप में याद कर रहे हैं। 

समर्थकों ने उन्हें गो पुत्र शहीद का दर्जा देने की मांग उठाई है, जिससे उनके संघर्ष और योगदान को आधिकारिक मान्यता मिल सके। फरसे वाले बाबा अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन ब्रज की सड़कों पर उनकी रात्रि की गश्त और गोरक्षा के लिए उनका जुनून लोगों की यादों में लंबे समय तक जिंदा रहेगा।
  • Related Posts

    रुदौली- विधायक रामचंद्र यादव की बड़ी सौगात, लगभग साठ लाख से बने पांच आंगनबाड़ी केंद्रों का लोकार्पण

      ग्रामीण बच्चों को बेहतर पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और सुविधायुक्त वातावरण उपलब्ध कराने की दिशा में रुदौली विधानसभा क्षेत्र को बड़ी सौगात मिली है। विधायक रामचंद्र यादव ने बुधवार को…

    अंकित हत्याकांड: पूरे गिरोह में कौन-कौन शामिल? सभी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग, पंचायत में हर पहलू पर चर्चा

    हरियाणवी गायक अंकित बालियान हत्याकांड को लेकर बृहस्पतिवार को बंतीखेड़ा गांव में बुलाई पंचायत में लोगों ने पुलिस की कार्रवाई पर संतोष जताया, लेकिन साथ ही कहा कि पुलिस हत्याकांड…