ऋषिकेश- दुखों के पहाड़ को पार कर मां ने संवारी बेटियों की तकदीर,इस तरह बनाया पीसीएस अधिकारी

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जिंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है, जहां हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता है। लेकिन कुछ लोग अपने साहस, मेहनत और दृढ़ संकल्प से उसी अंधेरे में उम्मीद की रोशनी जला देते हैं। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है नीलम भाटिया की, जिन्होंने 27 वर्ष की उम्र में पति को खोने के बाद हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना और अपनी दोनों बेटियों को पढ़ा-लिखाकर पीसीएस अधिकारी बना दिया।

प्रगति विहार निवासी नीलम भाटिया के पति अजय कुमार भाटिया आईएसबीटी क्षेत्र में परचून की दुकान चलाते थे। परिवार सामान्य जीवन जी रहा था, लेकिन अचानक हार्ट अटैक से पति की मौत ने सब कुछ बदल दिया। तब नीलम की उम्र मात्र 27 साल थी। कम उम्र में वैधव्य का दर्द, सिर पर डेढ़ और 6 साल की दो छोटी बेटियां शिल्पा और मीनाक्षी की जिम्मेदारी और आय का कोई स्थायी साधन नहीं।

 

मां के साथ टिफिन पहुंचाने निकल पड़तीं बेटियां
सबसे बड़ी बात यह कि मुश्किल समय में परिवार से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। नीलम बताती है कि ऐसे कठिन दौर में उन्होंने टूटने के बजाय खुद को संभाला। उन्होंने टिफिन सेवा शुरू की और घर-घर तथा कार्यालयों में भोजन पहुंचाने का काम शुरू किया।

 

सुबह से रात तक मेहनत कर वह बेटियों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाती रहीं। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने कभी बेटियों की शिक्षा से समझौता नहीं किया। मां के संघर्ष को बेटियों ने भी करीब से देखा। स्कूल की छुट्टी होते ही वे मां के साथ टिफिन पहुंचाने निकल पड़तीं और देर रात तक पढ़ाई करतीं। परिवार की परिस्थितियां कठिन थीं, लेकिन सपने बड़े थे। मां ने बेटियों को हमेशा यही सिखाया कि हालात चाहे जैसे हों, शिक्षा ही जिंदगी बदलने का सबसे बड़ा माध्यम है।

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वर्षों की मेहनत, त्याग और संघर्ष आखिरकार रंग लाया। दोनों बेटियों ने कठिन परिश्रम के बल पर प्रतियोगी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। आज बड़ी बेटी शालिनी मंडलीय अर्थ सांख्यिकी अधिकारी के पद पर पौड़ी में तैनात हैं, जबकि छोटी बेटी मीनाक्षी भाटिया का डिप्टी कलेक्ट्रेट पद पर चयन हुआ है। बेटियों की सफलता के साथ नीलम भाटिया का वह सपना भी पूरा हुआ, जो उन्होंने पति के निधन के बाद आंखों में संजोया था।


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