पीओके- नियंत्रण रेखा के दोनों ओर आंदोलन की तैयारी, भारत के लोगों से भी आंदोलन में शामिल होने की अपील

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जारी विद्रोह बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के कोर सदस्य सरदार अमन खान ने पीओके की जनता के साथ-साथ नियंत्रण रेखा के इस पार जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के नागरिकों से भी समर्थन मांगा है। यहां की जनता से सड़कों पर उतरने की गुहार लगाई है।

अमन खान ने कहा है कि पाकिस्तानी सेना की बर्बरता के खिलाफ आंदोलन में श्रीनगर, लद्दाख, पुंछ, राजौरी, मेंढर और जम्मू के लोग भी साथ दें। यह अपील पाकिस्तानी सेना की आर्थिक नाकेबंदी, इंटरनेट ब्लैकआउट और प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारियों के जवाब में आई है। खान ने चेतावनी दी कि रविवार का आंदोलन पाकिस्तानी हुकूमत के क्रूर दमन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई होगा। उनकी यह अपील क्षेत्र के भू-राजनीतिक समीकरण बदलने का माद्दा रखती है। दरअसल, पाकिस्तान हमेशा वैश्विक मंचों पर दावा करता रहा है कि वह कश्मीरियों का हमदर्द है, लेकिन अब खुद पीओके के नेता पाकिस्तानी दमन से बचने के लिए श्रीनगर और जम्मू से मदद और एकजुटता की गुहार लगा रहे हैं। यह पाकिस्तान के दशकों पुराने कश्मीर नैरेटिव के ध्वस्त होने की शुरुआत है।
एलओसी की प्रासंगिकता को चुनौती
यह पहला अवसर है, जब नियंत्रण रेखा के पार सार्वजनिक रूप से भारत के पक्ष में पुकार उठ रही है। इससे ठीक पहले रावलकोट के ईदगाह मैदान में जारी विरोध-प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों ने एक सुर में दोहराया था कि पीओके पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। वे स्थायी रूप से भारत के साथ जाने पर विचार कर सकते हैं। यह साफ संकेत है कि पीओके के नागरिक अब खुद को पाकिस्तान से अलग-थलग महसूस कर रहे और नियंत्रण रेखा के कृत्रिम विभाजन को नकार रहे हैं।
क्यों चुनी 5 जुलाई की तारीख?
दरअसल, 5 जुलाई, 1977 को ही पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक ने तख्तापलट कर सैन्य तानाशाही स्थापित की थी। पीओके के लोगों का इस दिन प्रदर्शन करना यह दिखाता है कि वे आज भी पाकिस्तानी हुकूमत को लोकतांत्रिक सरकार के बजाय सैन्य तानाशाही वाली सरकार के रूप में ही देखते हैं। रविवार को होने वाला प्रदर्शन पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ा सैन्य सिरदर्द साबित होने जा रहा है।
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