पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में जारी विद्रोह बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के कोर सदस्य सरदार अमन खान ने पीओके की जनता के साथ-साथ नियंत्रण रेखा के इस पार जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के नागरिकों से भी समर्थन मांगा है। यहां की जनता से सड़कों पर उतरने की गुहार लगाई है।
एलओसी की प्रासंगिकता को चुनौती
यह पहला अवसर है, जब नियंत्रण रेखा के पार सार्वजनिक रूप से भारत के पक्ष में पुकार उठ रही है। इससे ठीक पहले रावलकोट के ईदगाह मैदान में जारी विरोध-प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों ने एक सुर में दोहराया था कि पीओके पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। वे स्थायी रूप से भारत के साथ जाने पर विचार कर सकते हैं। यह साफ संकेत है कि पीओके के नागरिक अब खुद को पाकिस्तान से अलग-थलग महसूस कर रहे और नियंत्रण रेखा के कृत्रिम विभाजन को नकार रहे हैं।
यह पहला अवसर है, जब नियंत्रण रेखा के पार सार्वजनिक रूप से भारत के पक्ष में पुकार उठ रही है। इससे ठीक पहले रावलकोट के ईदगाह मैदान में जारी विरोध-प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों ने एक सुर में दोहराया था कि पीओके पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। वे स्थायी रूप से भारत के साथ जाने पर विचार कर सकते हैं। यह साफ संकेत है कि पीओके के नागरिक अब खुद को पाकिस्तान से अलग-थलग महसूस कर रहे और नियंत्रण रेखा के कृत्रिम विभाजन को नकार रहे हैं।
क्यों चुनी 5 जुलाई की तारीख?
दरअसल, 5 जुलाई, 1977 को ही पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक ने तख्तापलट कर सैन्य तानाशाही स्थापित की थी। पीओके के लोगों का इस दिन प्रदर्शन करना यह दिखाता है कि वे आज भी पाकिस्तानी हुकूमत को लोकतांत्रिक सरकार के बजाय सैन्य तानाशाही वाली सरकार के रूप में ही देखते हैं। रविवार को होने वाला प्रदर्शन पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ा सैन्य सिरदर्द साबित होने जा रहा है।
दरअसल, 5 जुलाई, 1977 को ही पाकिस्तान में जनरल जिया-उल-हक ने तख्तापलट कर सैन्य तानाशाही स्थापित की थी। पीओके के लोगों का इस दिन प्रदर्शन करना यह दिखाता है कि वे आज भी पाकिस्तानी हुकूमत को लोकतांत्रिक सरकार के बजाय सैन्य तानाशाही वाली सरकार के रूप में ही देखते हैं। रविवार को होने वाला प्रदर्शन पाकिस्तान सरकार के लिए बड़ा सैन्य सिरदर्द साबित होने जा रहा है।






