नेपाल त्रासदी: देवीघाट में 14 मौतें, 200 घर तबाह, मलबे के नीचे रिस रहा खून

त्रिशूली और तादी नदी के संगम पर बसा देवीघाट अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है। काठमांडो से करीब 70 किलोमीटर दूर यह कस्बा नेपाल का एकीकरकण करने वाले राजा पृथ्वी नारायण शाह से भी जुड़ा है। उनका अंतिम संस्कार इसी घाट पर हुआ था। यहां स्थित प्रसिद्ध जालपा देवी मंदिर भी लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है। त्रासदी में 14 मौतें और तबाह हुए 200 घरों के कारण यहां की तस्वीर बदल चुकी है।

जहां कभी घर, दुकानें और लोगों की चहल-पहल थी, वहां अब मलबे का ढेर है। मलबे और दलदल में अभी भी लोगों के दबे होने की आशंका है। सेना ने मोर्चा संभालते हुए सर्च अभियान शुरू कर दिया है। भौगोलिक रूप से देवीघाट नुवाकोट जिले के मुख्यालय विदुर के पास स्थित है।

 

त्रिशूली नदी का पानी कम होने के बाद यहां तबाही की तस्वीरें धीरे-धीरे सामने आने लगी हैं। लोग अपने घरों के मलबे में सामान और अपनों को तलाश रहे हैं। चारों तरफ तबाही के निशान हैं। दर्द इतना गहरा है कि कई लोग खुद को रोक नहीं पा रहे और फफक पड़ते हैं।

 

मलबे में जिंदगी की तलाश, सेना ने संभाला मोर्चा
मंगलवार को सेना के जवानों ने करीब एक घंटे तक मलबे से पटे घरों में सर्च अभियान चलाया। नगर पालिका की टीम भी मलबे से जरूरी सामान निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रही है। गांव की रूपाली समावेश ने सेना के जवानों को बताया कि उनके पड़ोस में गिरे एक मकान के पास दलदल में खून का रिसाव दिखाई दिया है।

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वहां एक जूता भी नजर आया। सूचना मिलते ही सेना ने इलाके को घेर लिया और जेसीबी की मदद से मलबा हटाने के निर्देश दिए। नदी किनारे रहने वाले गणेश अवस्थी ने बताया कि उनके घर के बगल में एक मकान पूरी तरह ढह गया है। उन्हें आशंका है कि उसमें एक व्यक्ति दबा हो सकता है। मलबे के आसपास लोगों की निगाहें लगातार किसी सुराग की तलाश में टिकी हैं।

 

नदी किनारे बसे घरों का नहीं बचा कोई निशान
जलप्रलय का सबसे ज्यादा असर नदी किनारे बसे परिवारों पर पड़ा है। देखते ही देखते नदी ने अपना रास्ता बदलते हुए आसपास के घरों को अपनी चपेट में ले लिया। कई मकान पूरी तरह बह गए, जबकि कुछ घरों के सिर्फ टूटे हिस्से और मलबे के ढेर ही बचे हैं।

 

यहां की लालपरी ने बताया कि 30 साल पहले उन्होंने गांव से आकर बाजार में दुकान खोली और छोटा सा घर बना लिया। जिंदगी बहुत अच्छे से कट रही थी पर एक झटके में सड़क पर आ गई। मेरे पास कुछ नहीं है। राहत शिविर में रह रही हूं। आगे की जिंदगी कैसे कटेगी पता नहीं। मैंने अपनी आंखों के सामने अपना घर और वर्षों की मेहनत को पानी में बहते देखा।

 

स्थानीय कारोबारियों के लिए यह सिर्फ दुकान टूटने का नुकसान नहीं है, बल्कि उनकी वर्षों की जमा पूंजी और रोजी-रोटी का जरिया भी खत्म हो गया है। जिन दुकानों से परिवारों का पालन-पोषण होता था, वहां अब सिर्फ तबाही के निशान दिखाई दे रहे हैं।

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