नहीं इतना पैसा कि रोज बाहर खाना खा सकें
इसी तरह दिल्ली के राजेंद्र नगर में रहकर प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने वाले दरभंगा, बिहार निवासी सुमित यादव ने बताया कि घर में गैस खत्म हो गया है। उनके पास इतना पैसा भी नहीं है कि रोजाना बाहर खाना खा सकें। ऐसे में उन्होंने घर जाना ही ठीक समझा।
दिहाड़ी से अधिक गैस की कीमत
उत्तर प्रदेश निवासी सलमान अली ने बताया कि दिल्ली में रहकर पहले से ही दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे थे। अब गैस की किल्लत और कालाबाजारी ने उसकी कमर तोड़ दी। उसने बताया कि उनकी कमाई प्रतिदिन 300-400 रुपये होती है और गैस की कीमत बाजारों में 600-800 रुपये प्रति किलो है। इस हिसाब से उनका दिल्ली में रहकर गुजारा करना नामुमकिन है।
बंगाल में चुनाव है, वहां तो दिक्कत नहीं होगी
दिल्ली में एलपीजी गैस संकट का सामना कर रहे पश्चिम बंगाल के लोगों में वापसी का दूसरी वजह भी देखी गई। उनका कहना था कि दिल्ली में खाने के लाले पड़ रहे हैं, लेकिन उनके गृह राज्य में चुनावी साल होने से तोहफों की भरमार है। सरकार वहां गैस की किल्लत नहीं होने दे रही है और खाने-पीने की सुविधा भी भरपूर है। पश्चिम बंगाल वापस जा रहे नदीम ने बताया कि वहां जाने से वोट तो देंगे ही, चुनावों के दौरान कोई संकट भी नहीं रहेगा।
किराए का बोझ और दो वक्त की रोटी की जंग जारी
आनंद विहार स्टेशन पर अपनी पोटली बांधे खड़े छोटे लाल की आंखों में बेबसी साफ देखी गई। वह बताते हैं कि साहब, काम बंद है, मालिक ने हाथ खड़े कर दिए हैं। मकान मालिक किराया मांग रहा है, लेकिन यहां तो पेट भरने के लाले पड़े हैं। जब गैस ही नहीं मिलेगी तो खाना कहां बनाएंगे। बताया कि कम से कम गांव में सूखी रोटी तो नसीब होगी।
पलायन शौक नहीं मजबूरी बनी
दिल्ली में रहकर अपना जीवन यापन करना अब गरीब मजदूर प्रवासियों के लिए मुश्किल हो गया है। मजदूरों का भरोसा अब व्यवस्था से उठ गया है। ऐसे में गरीब और मजदूर लोगों के लिए पलायन शौक नहीं मजबूरी बन चुकी है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशनों पर लंबी-लंबी लाइनें और अपनों के साथ सिसकते चेहरे यह बता रहे हैं कि महानगरों की चकाचौंध के पीछे का अंधेरा कितना गहरा है।