फरवरी 1997 में पप्पू सात साल का था। वह घर के बाहर खेल रहा था। बिजली विभाग की ओर से गली में सड़क पर ही ट्रांसफाॅर्मर रखा गया था। इससे पप्पू को करंट लग गया। परिवार के पास इतना पैसा नहीं था कि बेटे का इलाज करा सकें। कर्ज लेकर इलाज कराया। मगर दोनों हाथ कट गए। लापरवाह विभागीय अधिकारियों पर कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ, मुआवजा भी नहीं मिला। इससे पहले पिता, फिर खुद पप्पू और बाद में मां शांति देवी की भी जान चली गई।









