फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनाने वाले गिरोह का भंडाफोड़, दलालों के सिंडिकेट ने सिस्टम में लगाई सेंध

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यूपी के बस्ती जिले में दलालों के सिंडिकेट ने 4500 से अधिक फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनवा दिए। इनसे करीब 4.75 करोड़ रुपये की वसूली की गई है। दलालों ने फर्जी तरीके से आवेदकों की बैकलॅाग एंट्री अरुणाचल प्रदेश से करवाकर बस्ती में लाइसेंस बनवाए हैं। इतना ही नहीं अफसरों की शह पर दलालों ने मिर्जापुर, संतकबीनगर, पडरैाना, गोरखपुर और आसपास के जिलों के आवेदकों के डीएल बस्ती से बनवा दिए हैं। ऐसे में सड़क सुरक्षा पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

 

रामतीरथ मैार्य का डीएल नंबर यूपी63 20180030028 है। जोकि मिर्जापुर आरटीओ का है। उनके डीएल की बैकलॅाग एंट्री सेप्पा(अरुणाचल प्रदेश) से वर्ष 2018 में करवाई और बस्ती में वर्ष 2026 में एड्रेस चेंज की रसीद काटकर डीएल बनाया गया। ऐसे ही मनीष यादव का डीएल नंबर यूपी57 20170098799 है। यह पडरैाना का है। उनके डीएल की भी बैकलॅाग एंट्री सेप्पा से 2017 में हुई और बस्ती में रिन्यूवल करवाया गया। करण गुप्ता का डीएल नंबर यूपी51 20200018137 है, जिसकी बैकलॅाग एंट्री सियांग(अरुणाचल प्रदेश) से हुई और दलालों ने लाइसेंस बस्ती से बनवा दिया। यूपी51 20200034451, यूपी53 20190077236, यूपी57 20170098787, यूपी63 20180030001, यूपी63 20180030028, यूपी53 20190077236 सहित दर्जनों ऐसे फर्जी तरीके से बनवाए गए डीएल हैं, जिनका रिकॅार्ड अमर उजाला के पास है। इन डीएल में दलालों के सिंडिकेट ने अफसरों की शह पर फर्जी तरीके से डीएल बनवाकर आवेदकों से मोटी रकम वसूली है। खास बात यह है कि इन आवेदकों का लर्नर लाइसेंस नहीं बनवाया गया और नियमों को ताक पर रखकर डीएल बनवाए गए हैं। 

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प्रक्रिया: ऐसे बनते हैं डीएल

डीएल बनवाने के लिए आवेदक को पहले लर्नर लाइसेंस बनवाना होता है। इसकी प्रक्रिया ऑनलाइन है। आवेदक को आरटीओ जाने की आवश्यकता नहीं होती है। ऑानलाइन आवेदन कर टेस्ट देने के बाद यह बन जाता है। लर्नर बनने के एक महीने बाद से लेकर छह महीने के बीच परमानेंट डीएल बनता है। इसमें आरटीओ जाकर बायोमेटि्रक और वाहन टेस्ट पास करना पड़ता है। इसके बाद हफ्ते से दो हफ्ते के अंदर डाक से डीएल घर पहुंचता है। हेवी लाइसेंस बनवाने के लिए आवेदक के पास एक साल पुराना डीएल होना जरूरी है।

खेल: अरुणाचल में फीडिंग, बस्ती में रिन्यूवल
दलालों का सिंडिकेट बस्ती में अफसरों की शह पर काम कर रहा है। यही वजह है कि डीएल पडरैाना का हो, गोरखपुर, सिद्धार्थनगर, कुशीनगर या अन्य किसी जिले का, उसकी बैकलॅाग एंट्री अरुणाचल प्रदेश के सेप्पा व सियांग से करवाई जाती है। उसके बाद डीएल में पता बदलने या रिन्यूवल का आवेदन बस्ती से करवाकर लाइसेंस बनवा दिया जाता है। इसके एवज में आवेदक से मोटी रकम वसूली जाती है।

अफसरों की मिलीभगत से पनपा सिंडिकेट
आरटीओ बस्ती परिवहन विभाग का संभाग है। संतकबीरनगर, सिद्धार्थनगर प्रमुख रूप से इसके अंतर्गत आते हैं। बस्ती में आरटीओ फरीदउद्दीन, आरआई सीमा गैातम, एआरटीओ माला बाजपेयी की तैनाती है। लेकिन दलालों का सिंडिकेट खुलेआम काम कर रहा है और अफसरों को इसकी जानकारी तक नहीं। उपरोक्त अफसरों की जवाबदेही भी है। उनकी कार्यशैली पर सवाल उठने लाजिमी हैं।

वसूली: आवेदकों से डीएल के एवज में वसूले गए 4.50 करोड़

बस्ती में एक्टिव दलालों के सिंडिकेट ने अफसरों की मिलीभगत से जो रैकेट तैयार किया, उसमें अनुमानित तैार पर 4500 से अधिक डीएल बनवाए गए। आवेदकों से औसतन दस हजार रुपये वसूले गए। इससे करीब 4.75 करोड़ रुपये कमाए गए। सूत्र बताते हैं कि दलालों ने वसूली की इस रकम में अफसरों को भी हिस्सा दिया।

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सवाल: बैकलॅाग एंट्री क्यों, कहां हैं लर्नर लाइसेंस
जनवरी, 2013 से पहले मैनुएली लाइसेंस बनते थे। जिनका रिकॅार्ड रजिस्टर में रखा जाता था। इसके बाद स्मार्ट कार्ड बनने शुरू हो गए। रिकॅार्ड कम्प्यूटर में रखा जाने लगा। वर्ष 2013 के बाद लाइसेंसों का रिकॅार्ड ऑनलाइन ही है। उन्हें रजिस्टर में रखने की आवश्यकता खत्म हो गई। लेकिन दलालों ने अफसरों से मिलीभगत कर बैकलॅाग एंट्री करवाई और एड्रेस चेंज व रिन्यूवल करवाकर डीएल बनवा दिए। ऐसे में सवाल उठता है कि बैकलॅाग फीडिंग की जरूरत क्यों पड़ी। इतना ही नहीं सूत्र बताते हैं कि लर्नर लाइसेंस बनवाए बगैर परमानेंड डीएल बना दिए गए। इतना ही नहीं भारी वाहनों के हेवी लाइसेंस के लिए एक साल पुराना लाइसेंस अनिवार्य है। इस नियम को भी ताक पर रखकर डीएल बनवाए गए।

सड़क सुरक्षा की सिर्फ फिक्र, संजीदगी नहीं
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से लगातार सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही जा रही है, लेकिन परिवहन विभाग के अफसर तनिक भी संजीदगी नहीं बरत रहे हैं। यही वजह है कि लखनऊ राजधानी में सड़क हादसे बढ़ रहे हैं, फिर जिलों की स्थिति समझी जा सकती है। फर्जी तरीके से लाइसेंस बनाए जा रहे हैं, ऐसे में सड़क सुरक्षा को अमलीजामा पहनाया जाना नामुमकिन है।-दयाशंकर सिंह, परिवहन मंत्री


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