IIT जोधपुर में हुई बड़ी खोज- मानव शरीर का प्रोटीन रोक सकता है खतरनाक बैक्टीरियल बायोफिल्म

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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जोधपुर के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि मानव शरीर में स्वाभाविक रूप से मौजूद एक प्रोटीन बैक्टीरिया द्वारा बनने वाली खतरनाक और अत्यधिक प्रतिरोधक बायोफिल्म को बनने से रोक सकता है। यह शोध विश्व की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका Proceedings of the National Academy of Sciences, अमेरिका में प्रकाशित हुआ है।

 

बायोफिल्म क्यों है गंभीर चुनौती?
आमतौर पर बैक्टीरिया को अकेली कोशिकाओं के रूप में देखा जाता है, लेकिन कई बार वे आपस में जुड़कर एक मजबूत परत बना लेते हैं, जिसे बायोफिल्म कहा जाता है। यह परत प्रोटीन, शर्करा और डीएनए से मिलकर बनती है और बैक्टीरिया के लिए एक सूक्ष्म ढाल का काम करती है। बायोफिल्म में मौजूद बैक्टीरिया सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में 1,000 गुना अधिक एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हो सकते हैं।

बायोफिल्म आमतौर पर कैथेटर, कृत्रिम हृदय वाल्व, हड्डी के इम्प्लांट और पुराने तथा न भरने वाले घावों में पाई जाती है। यह लंबे समय तक चलने वाले संक्रमणों का कारण बनती है और वैश्विक स्तर पर एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस की समस्या को बढ़ाती है।

शोध में क्या सामने आया?
एस्केरिचिया कोली (ई. कोलाई) में बायोफिल्म बनने के लिए कर्ली नामक एक महत्वपूर्ण प्रोटीन जिम्मेदार होता है। यह एक ढांचे की तरह कार्य करता है, जिससे बैक्टीरिया सतह पर चिपकते हैं और आपस में जुड़ते हैं। आईआईटी जोधपुर की टीम ने पाया कि मानव शरीर में मौजूद एसएस2-माइक्रोग्लोब्यूलिन नामक प्रोटीन इस प्रक्रिया को रोक सकता है। यह प्रोटीन बैक्टीरिया को मारने के बजाय कर्ली के बनने की शुरुआती प्रक्रिया को ही बाधित कर देता है, जिससे बायोफिल्म का निर्माण नहीं हो पाता। इस तरह यह बैक्टीरिया की सुरक्षा ढाल को कमजोर करता है और प्रतिरोध विकसित होने की संभावना को कम कर सकता है।

यह पारंपरिक एंटीबायोटिक से अलग एक नया उपचार दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है और इसमें घाव भरने की क्षमता भी होने की संभावना जताई गई है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट हुआ कि एसएस2-माइक्रोग्लोब्यूलिन की भूमिका केवल प्रतिरक्षा प्रणाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संक्रमण नियंत्रण में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

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वैज्ञानिक की प्रतिक्रिया
इस शोध की प्रमुख वैज्ञानिक और संबंधित लेखक डॉ. नेहा जैन (एसोसिएट प्रोफेसर, बायोसाइंस एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी जोधपुर) ने कहा कि बायोफिल्म लंबे समय तक चलने वाले संक्रमणों के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक और प्रतिरक्षा प्रणाली से बचाती है। उन्होंने बताया कि एसएस2-माइक्रोग्लोब्यूलिन कर्ली के निर्माण को रोककर बायोफिल्म बनने से रोक सकता है। यह बैक्टीरिया को सीधे मारने के बजाय उनकी सुरक्षा संरचना को कमजोर करता है, जिससे प्रतिरोध का खतरा कम होता है और शरीर की अपनी जैविक प्रणाली से प्रेरित नई चिकित्सा विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होता है।

 

 

वैश्विक स्वास्थ्य के लिए संकेत
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में माना जाता है। पारंपरिक एंटीबायोटिक बैक्टीरिया को मारती हैं, लेकिन समय के साथ प्रतिरोधी स्ट्रेन विकसित हो जाते हैं। यह शोध एक वैकल्पिक रणनीति प्रस्तुत करता है, जिसमें बैक्टीरिया को समाप्त करने के बजाय उनकी सुरक्षा ढाल को कमजोर कर संक्रमण पर नियंत्रण पाने की दिशा में काम किया जा सकता है।


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