अयोध्या: मोदी बनेंगे संघर्ष से शिखर तक के गवाह 

25 नवंबर को पीएम मोदी सिर्फ राम मंदिर पर ध्वज पताका ही नहीं फहराएंगे, बल्कि मंदिर आंदोलन के लंबे संघर्षों से लेकर इसके शिखर तक के गवाह भी बनेंगे। यह स्वर्णिम अवसर उनके लिए सिर्फ राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संघर्षों के दौरान लिए गए संकल्पों की परिणति भी है।
राम मंदिर के लिए संघर्ष की कहानी सदियों पुरानी है। मंदिर को इसकी पूर्णता तक पहुंचाने का सपना देखने वाले लाखों लोगों में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम जुड़ा रहा है। अस्सी के दशक से ही वह आरएसएस के प्रचारक के रूप में सक्रिय थे। उस दौरान भव्य राम मंदिर बनाने का संकल्प लिए वह कई संगठनात्मक बैठकों और अभियानों में भाग लेते थे।

 

1987 से 1989 के बीच आंदोलन की धार तेज होने पर उन्होंने कई संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाईं। 1990 में पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की ओर से निकाली गई रामरथ यात्रा के वह मुख्य प्रबंधक और रूट समन्वयक के रूप में आगे रहे। सुप्रीम कोर्ट से फैसला आने के बाद उन्होंने अपनी निगरानी में अयोध्या को उसकी गरिमा के अनुरूप सजाने-संवारने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

पांच अगस्त, 2020 को उनके ही हाथों से भूमिपूजन हुआ। 22 जनवरी, 2024 को उन्हीं के हाथों से रामलला की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। अब प्रधानमंत्री समेत करोड़ों हिंदुओं का सपना साकार हो चुका है। यह मंदिर अब अपने पूर्ण स्वरूप की ओर अग्रसर है। 25 नवंबर को इसके शिखर पर ध्वज पताका फहराकर पीएम इस पूरी यात्रा के साक्षी बनते हुए मंदिर के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज होने जा रहे हैं।

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