राम मंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट एसआईटी ने मंगलवार सुबह अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद को सौंप दी है। रिपोर्ट में चढ़ावा चोरी से लेकर कमीशनखोरी के खेल के सुबूत हैं। मंदिर में कर्मचारियों की नियुक्ति, गणना प्रक्रिया में भी बड़े हेरफेर की आशंका एसआईटी ने जताई है। उससे संबंधित तमाम साक्ष्य जुटाए हैं। गवाहों का भी जिक्र रिपोर्ट में किया गया है।
बिना तलाशी के कर्मियों की आवाजाही
मंदिर परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम होने के बावजूद ट्रस्ट की तरफ से रखे गए ये कर्मचारी गले में आईकार्ड पहनकर मंदिर के कोने-कोने तक बेखौफ आते-जाते थे। सबसे बड़ी चूक यह रही कि ट्रस्ट के अपने लोग होने के कारण इन कर्मचारियों की न तो कोई तलाशी ली जाती थी और न ही इनका सत्यापन किया गया था। आरोप है कि महाकुंभ और माघ मेले के दौरान जब चढ़ावा कई गुना बढ़ गया था, तो इसका फायदा उठाकर इन चोरों ने लंबी गिनती का फायदा उठाया और एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक पार कर दिए।
कम वेतन की आड़ में बड़ा खेल
पकड़े गए कर्मचारी मात्र 12 से 18 हजार रुपये के मासिक वेतन पर काम कर रहे थे। इतने कम वेतन के बावजूद वे दिन-रात मंदिर में लंबी ड्यूटी करते थे, क्योंकि उन्हें वेतन से कोई फर्क नहीं पड़ता था, वे चढ़ावे की करोड़ों की रकम पार कर रहे थे। चूंकि ये कर्मचारी ट्रस्ट की सिफारिश पर रखे गए थे, इसलिए बैंक अधिकारियों ने भी इनकी कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए। इस पूरे मामले में बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
सीसीटीवी और निगरानी तंत्र की विफलता
भले ही परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगे थे, लेकिन निगरानी व्यवस्था और ऑडिट पूरी तरह से अप्रभावी रहे। वास्तव में सीसीटीवी कैमरों ने घटनाओं को रिकॉर्ड किया था, लेकिन रियल-टाइम मॉनिटरिंग न होने के कारण चोरी का तुरंत पता नहीं चला। अब एसआईटी की जांच शुरू होने के बाद इन सीसीटीवी फुटेज को साक्ष्य के रूप में कब्जे में लिया गया है, जिनसे मामले में कई अहम खुलासे होने के अनुमान हैं। हालांकि, ट्रस्ट के पूर्व पदाधिकारी महिपाल सिंह ने आरोप लगाया था कि आठ महीने के सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दिए गए थे।







