अयोध्या- साध्वी चंदनामती का 38वां दीक्षा दिवस बना ‘प्रेरणा दिवस’, त्याग और संयम की साधना को किया नमन

 

 

जैन धर्म की प्रज्ञाश्रमणी साध्वी चंदनामती का 38वां दीक्षा दिवस रविवार को दिगंबर जैन मंदिर में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ ‘प्रेरणा दिवस’ के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम में देशभर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने साध्वी चंदनामती के त्याग, तप, संयम और साधना को नमन करते हुए उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संकल्प लिया।
इस अवसर पर जैन समाज के लिए गौरव का विषय रहा कि साध्वी चंदनामती की गुरु एवं जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी 92 वर्षीय गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता भी उपस्थित रहीं। स्थानीय जैन तीर्थों के साथ देश के अनेक प्राचीन तीर्थ स्थलों के उन्नायक पीठाधीश रवींद्रकीर्ति स्वामी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने साध्वी चंदनामती के आध्यात्मिक जीवन की उपलब्धियों को याद किया। कार्यक्रम में इंजीनियर गुणसागर जैन, कैलाशचंद्र जैन, लखनऊ व्यापार मंडल के उपाध्यक्ष विनोद माहेश्वरी सहित अनेक गणमान्य लोग मौजूद रहे।
ज्ञानमती माता और चंदनामती की जोड़ी को बताया ब्राह्मी-सुंदरी के समान
कार्यक्रम का संचालन कर रहे डॉ. जीवनप्रकाश ने कहा कि जैन समाज में गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता और साध्वी चंदनामती की जोड़ी को प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की पुत्रियों ब्राह्मी और सुंदरी के समान माना जाता है। ब्राह्मी को भाषा एवं लिपि तथा सुंदरी को अंक एवं गणित के ज्ञान से जोड़ा जाता है। इसी प्रकार ज्ञानमती माता और साध्वी चंदनामती ने ज्ञान, अध्यात्म और धर्म के प्रचार-प्रसार के माध्यम से समाज को नई दिशा देने का कार्य किया है।
11 वर्ष की उम्र में छोड़ा सांसारिक मोह, 1989 में ली जैनेश्वरी दीक्षा
बाराबंकी जिले के टिकैतनगर में करीब 68 वर्ष पूर्व जन्मीं साध्वी चंदनामती ने महज 11 वर्ष की आयु में गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता के संघ में प्रवेश किया। बचपन से ही अध्यात्म और संयम के प्रति उनका रुझान रहा। ज्ञान, आराधना और तपस्या के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते हुए उन्होंने वर्ष 1989 में जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की।
दीक्षा के बाद से साध्वी चंदनामती ने अपना जीवन जैन धर्म के सिद्धांतों, आध्यात्मिक साधना और समाज में धार्मिक चेतना के प्रसार को समर्पित किया। उनके 38वें दीक्षा दिवस पर श्रद्धालुओं ने कहा कि उनका जीवन त्याग, तपस्या और आत्मसंयम की ऐसी प्रेरणादायी यात्रा है, जो आने वाली पीढ़ियों को भी धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती रहेगी।

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