टाटा ट्र्रस्ट के बोर्ड की बैठक बैठक 10 अक्तूबर को समूह के मुख्यालय बाम्बे हाउस में दोपहर दो बजे तक चली। इसमें बोर्ड के कुछ सदस्य व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहे रहे, जबकि कुछ सदस्य वीडियों कॉल के जरिए बोर्ड की बैठक से जुड़े। सूत्रों के अनुसार बैठक में ट्रस्ट प्रशासन के उचित संचालन, फंडिंग की जानकारी, नियमों के अनुपालन की समीक्षा हो सकती है। खबरें है कि ट्रस्टियों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को नया करने पर विशेष चर्चा नहीं हुई है।
क्या है टाटा समूह में विवाद का कारण?
विवाद की शुरुआत टाटा के बोर्ड में नियुक्तियों और संचालन से जुड़ी नीतियों को लेकर हुई। रिपोर्ट्स के अनुसार, टाटा ट्रस्ट में दो धड़े बन गए हैं। एक धड़ा नोएल टाटा यानी दिवंगत रतन टाटा के सौतेले भाई के साथ है। दूसरा धड़ा मेहली मिस्त्री (दिवंगत साइरस मिस्त्री के चचेरे भाई) के साथ है। इनका संबंध शापूरजी पल्लोनीजी परिवार से है। जिनकी टाटा समूह में अच्छी-खासी हिस्सेदारी है। इससे पहले, 11 सितंबर को हुई बोर्ड मीटिंग में पूर्व डिफेंस सेक्रेटरी विजय सिंह बोर्ड में फिर से नॉमिनेट करने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन कुछ ट्रस्टियों ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद मेहली मिस्त्री को नामित करने का प्रस्ताव आया। लेकिन नोएल टाटा और वीनू श्रीनिवासन ने इसका विरोध किया। इससे विवाद और गहरा गया।
टाटा समूह की गतिविधियों पर क्यों है सरकार की नजर?
एक समय पर टाटा समूह में विवाद इतना बढ़ गया कि गृह मंत्री अमित शाह औरवित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने नोएल टाटा और टाटा संस के चेयरपर्सन एन चंद्रशेखरन के साथ उच्च स्तरीय बैठक की। विशेषज्ञ सुनील दवे के अनुसार, टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस की लगभग 66% हिस्सेदारी है। इससे यह यह समूह की होल्डिंग कंपनी को नियंत्रित करता है। यदि यह विवाद और गहराता है, तो इसका असर सिर्फ शेयर बाजार और निवेशकों पर ही नहीं, बल्कि सीधे भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। टाटा ग्रुप की सूचीबद्ध कंपनियों में करीब ₹25 लाख करोड़ से अधिक का निवेश है। यह समूह भारत की जीडीपी में लगभग 4% का योगदान देता है।
टाटा प्रकरण में अब तक क्या-क्या हुआ आइए जानें
मंगलवार को नोएल टाटा और चंद्रशेखरन, टाटा ट्रस्ट के उपाध्यक्ष वेणु श्रीनिवासन और ट्रस्टी डेरियस खंबाटा के साथ गृह मंत्री अमित शाह से उनके आवास पर मिले थे। इस दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी मौजूद थीं। यह बैठक टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टियों के बीच बोर्ड नियुक्तियों और प्रशासन के मुद्दों पर चल रहे अंदरूनी कलह की पृष्ठभूमि में हुई। इस कलह के कारण 180 अरब डॉलर से अधिक के समूह के कामकाज पर असर पड़ने का खतरा है।
टाटा ट्रस्ट्स, नमक से लेकर सेमीकंडक्टर तक के कारोबार करने वाले समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस में अपनी लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी के माध्यम से भारत के सबसे मूल्यवान समूह पर निर्णायक प्रभाव डालता है। सूत्रों के अनुसार टाटा ट्रस्ट्स में दो हिस्से हैं। एक हिस्सा नोएल टाटा के साथ जुड़ा है। उन्हें रतन टाटा के निधन के बाद ट्रस्ट का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। चार ट्रस्टियों के दूसरे समूह का नेतृत्व मेहली मिस्त्री कर रहे हैं। इनका संबंध विस्तारित शापूरजी पलोनजी परिवार से है। इनके पास टाटा संस में लगभग 18.37 प्रतिशत हिस्सेदारी है। मेहली को कथित तौर पर लगता है कि उन्हें महत्वपूर्ण मामलों से दूर रखा गया है।
सूत्रों के अनुसार, विवाद का मुख्य कारण टाटा संस के बोर्ड की सीटें हैं। जो 156 वर्ष पुराने समूह को नियंत्रित करती है। इसमें 30 सूचीबद्ध कंपनियों सहित लगभग 400 कंपनियां शामिल हैं। इस विवाद पर टाटा ट्रस्ट्स के छह ट्रस्टियों की बैठक के दौरान चर्चा होने का अनुमान है। यह ट्रस्ट्स सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और रतन टाटा ट्रस्ट सहित कई धर्मार्थ ट्रस्टों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक प्रमुख समूह है।
इससे पहले 11 सितंबर को हुई बैठक पूर्व रक्षा सचिव विजय सिंह को टाटा संस बोर्ड में नामित निदेशक के रूप में पुनः नियुक्त करने पर विचार करने के लिए बुलाई गई थी। टाटा ट्रस्ट्स के सात ट्रस्टी हैं। इनमें सिंह भी शामिल हैं। सिंह 11 सितंबर की बैठक में शामिल नहीं हुए क्योंकि उनका नामांकन एजेंडे में था।
अक्तूबर 2024 में रतन टाटा की मौत के बाद टाटा ट्रस्ट्स ने एक नीति पेश की। इसके तहत टाटा संस बोर्ड में नामित निदेशकों की 75 वर्ष की आयु पूरी होने पर सालाना आधार पर उनके शामिल होने या नहीं होने पर फैसला लेने को जरूरी बना दिया गया था। 11 सितंबर की बैठक में 77 वर्षीय सिंह- जो 2012 से निदेशक और 2018 से ट्रस्टी थे- की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन (टीवीएस समूह के मानद अध्यक्ष) की ओर से किया गया था। चार अन्य ट्रस्टियो- मेहली मिस्त्री, प्रमित झावेरी, जहांगीर एचसी जहांगीर और डेरियस खंबाटा- ने इस कदम का विरोध किया। इसके कारण प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया।
इसके बाद चार ट्रस्टियों ने मेहली मिस्त्री को टाटा संस बोर्ड में नामित करने की मांग की। लेकिन नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन ने इस कदम का विरोध किया और टाटा के मूल्यों के अनुसार पारदर्शी प्रक्रिया की जरूरत पर बल दिया। इसके बाद, सिंह ने स्वेच्छा से टाटा संस बोर्ड से इस्तीफा दे दिया था







